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देश के बंटवारे को बचाने की आखिरी कोशिश के तौर पर गांधी ने जिन्ना को प्रधानमंत्री बनाने का प्रस्ताव बेशक रखा था लेकिन मार्के का सवाल यह नहीं है कि प्रस्ताव को पहले नेहरू ने ठुकराया या पटेल ने.

 

‘कुछ ऐसी बात ना थी तेरा दूर हो जाना

ये और बात कि रह-रह के दर्द उठता था’

असम में एनआरसी यानी राष्ट्रीय नागरिक रजिस्टर की जिस अंतिम लिस्ट को जारी किया गया है, उसमें करगिल युद्ध में मारे गए एक सैनिक के भतीजे का नाम नहीं है.


 

ग्रेनेडियर चिनमॉय भौमिक राज्य के कछार इलाक़े के बोरखोला चुनाव क्षेत्र के रहने वाले थे और उनकी मौत करगिल युद्ध के दौरान 1999 में हुई थी. चिनमॉय के 13 साल के भतीजे पिनाक भौमिक का नाम एनआरसी की इस लिस्ट से ग़ायब है जबकि उनके माता-पिता और परिजनों के नाम लिस्ट में है. इस परिवार के तीन लोगों ने भारतीय सेना में नौकरी की है और चिनमॉय के अलावा बड़े भाई संतोष और छोटे भाई सजल भौमिक फ़ौज से रिटायर हुए हैं.

असम की पहली महिला मुख्यमंत्री सैयदा तैमूर पिछले कुछ सालों से आॅस्ट्रेलिया में रह रही हैं. उन्होंने कहा कि यह निराशाजनक है कि उनका नाम सूची में नहीं है.


 

गुवाहाटी: असम की एकमात्र महिला मुख्यमंत्री रहीं सैयदा अनोवरा तैमूर का नाम राष्ट्रीय नागरिक रजिस्टर (एनआरसी) में नहीं है और उन्होंने इस रजिस्टर में अपने और अपने परिवार का नाम दर्ज कराने की प्रक्रिया शुरू करने के लिए आॅस्ट्रेलिया से वापस आने की योजना बनाई है.

केंद्र सरकार ने राज्यों व केंद्रशासित प्रदेशों को सोशल मीडिया पर फैलाई गई अफवाहों के उकसावे में आकर उन्मादित भीड़ द्वारा बेकसूरों को पीट-पीटकर मार डालने की एक के बाद एक बढ़ती घटनाएं रोकने को कहा है. गृह मंत्रालय ने भी अपने परामर्श में उन्हें ऐसे उकसावे रोकने के कई उपाय सुझाए हैं.


 

तब सरकार समर्थक मीडिया में भी किसी ने यह नहीं कहा कि उसका यह कदम ऐसी घटनाओं को लेकर उसकी संवेदनशीलता या उन्हें रोकने की नीयत का पता देता है. कोई इसे उसकी कुंभकर्णी नींद का टूटना बताकर रह गया और कोई देर से ही सही, दुरुस्त आना.

दिल्ली - दिल्ली मेट्रो के मॉडल टाउन रेलवे स्टेशन के पास शुक्रवार सुबह 9.45 बजे एक मोर ट्रैक पर मिला पड़ा, जिसकी वजह से तकरीबन 33 मिनट तक येलो लाइन का रेड सिग्नल ही रहा।

ज़ख्मी पड़ा था ट्रैक पर राष्ट्रीय पक्षी

दरअसल सुबह लगभग 9:45 पर मेट्रो जैसे ही माडल टाउन स्टेशन पर पहुंची तभी ड्राइवर ने देखा की एक मोर ट्रैक पर घायल पड़ा हुआ है जिसके बाद मोर की सुरक्षा को देखते हुुए मेट्रो को रोके रखा। 

सफाई कर्मचारियों ने हटाया मोर को

जो कर्मचारी अपनी डीएमआरसी से अपनी मांगे रख रहे हैं उन्ही सफाई कर्मचारियों ने ट्रैक पर जा कर मोर को पकड़ा और उसे फिर हटाया गया।

वाइल्ड लाइफ टीम को सौंपा मोर

मोर को हटाने के बाद वाइल्ड लाइफ टीम मॉडल टाउन मेट्रो स्टेशन पहुंची और मोर को ले लिया। जिसके बाद पशु पक्षी अस्पताल में मोर को भेजा गया और उसका इलाज कराया गया।

 

 33 मिनट तक रुकी रही मेट्रो

सुबह 9.45 बजे से लेकर सुबह 10 बजकर 18 मिनट तक मेट्रो रुकी रही जिसकी वजह से तकरीबन 33 मिनट तक मेट्रो रुकी रही और इससे यात्रियों को काफी परेशानी का सामना करना पड़ा। 

(शहज़ादा हाशमी की कलम से)

दिल्ली - देश विदेश में 21 जून को विश्व योग दिवस मनाया गया, जहां पीएम मोदी ने देहरादून में योग दिवस मनाया तो सभी कैबिनेट मंत्री सांसद, विधायकों ने भी सुबह सुबह योग दिवस मनाया। वहीं आईए आपको बताते हैं कि दिल्ली में किस किस सरकारी दफ्तर में योग दिवस मनाया गया। 

फायर की कॉल पर भी आगे, देश के साथ योगा में भी आगे फायर सर्विस

 

पूरा देश एक साथ योग कर रहा हो और भला फायर सर्विस इस बात को भूल जाए ऐसा हो ही नही सकता। दिल्ली फायर सर्विस ने भी देश की जनता के साथ साथ योग किया। यानि दिल्ली फायर सर्विस भी पीछे नही रहा। दिल्ली फायर सर्विस ने दिल्ली में अपने मुख्यालय में विश्व योगा दिवस मनाया और इसमें डायरेक्टर जीसी मिश्रा, डिप्टी डाय. गर्ग, चीफ फायर अधिकारी विपिन कैंटल समेत कई अधिकारी और कर्मचारी भी मौजूद थे। जिन्होंने सुबह 7 बजे से योगा की।

योग के साथ साथ ड्यूटी भी
दिल्ली फायर सर्विस ने अपने ज़िम्मेदारी निभाते हुए देश के साथ योगा भी की और साथ ही साथ अपनी हर टुकड़ियां तैनात भी रखी कि जस वक्त भी कोई फायर की कॉल आए तो फौरन उसपर फायरकर्मी पहुंच सके। वहीं दिल्ली फायर सर्विस के डायरेक्टर जीसी मिश्रा,डिप्टी डायरेक्टर अतुल गर्ग,मुख्य फायर अफसर विपिन केंटल समेत कई अधिकारियों ने योगा की साथ ही साथ कर्मचारियों ने भी योग किया। वहीं जीसी मिश्रा ने कहा कि हमारे कर्मी हमेशा आपातकालीन स्थिति में काम करते हैं और योग करने से उनका शरीर हमेशा फ्रेश रहेगा। योग मानसिक और शारिरिक रूप से फायदेमंद है। उन्होंने सबसे अपील भी करी की योग को कभी नही भूलें और ज़रूर सुबह योग करें।
 
अर्द्धसैनिक बल ने भी की योगा
पूरे देश ने 4वां अंतरराष्ट्रीय योगा दिवस मनाया साथ ही साथ अर्द्धसैनिक बल ने भी दिल्ली समेत जहां जहां उनकी पोस्टिंग है वहां वहां योग की। बॉर्डर की बात हो या आसमान की.. हर जगह इस योग दिवस पर सुबह सिर्फ और सिर्फ योगा ही हो रही थी साथ ही दिल्ली में भी CISF ने अपना पूरा जोर दिखा दिया।
लाल किले में अर्धसैनिक बल की तकरीबन 2000 महिलाओं ने योग दिवस पर योगा की और योगा से पहले CISF की दिल्ली मेट्रो में चेकिंग करने वाली महिला कर्मियों ने ऐसा करतब दिखाया कि हर आदमी इन महिलाओं से दूर ही भागेगा। 
 
योगा के साथ किया सेल्फ डिफेंस भी
लाल किले में अर्धसैनिक बल की तकरीबन 2000 महिलाकर्मियों ने सुबह 7 बजे से योगा की लेकिन योगा से पहले CISF की दिल्ली मेट्रो में चेकिंग करने वाली महिलाकर्मियों ने सेल्फ डिफेंस करके दिखाया। उन्होंने डेमो देते हुए दिखाया कि कैसे एक महिला भी 3 3 आदमियों पर भारी रह सकती है और कैसे अपनी जान बचा सकती है।  साथ ही उन महिलाओं ने दिखाया कि हर महिला के अंदर आत्मविश्वास होना बहुत ज़रूरी है जिससे वो हर परेशानी में विजयी प्राप्त कर सकें। साथ ही राजपथ सुबह 10 बजे तक पूरा बन्द था और वहां सिर्फ और सिर्फ मंत्र और योग के आसन की ही आवाज़ आ रही थी। सुबह 7 बजे से राजपथ पर भी तकरीबन 1000 अर्धसैनिक बल के कर्मियों ने योगा की। सीजीओ कॉम्प्लेक्स में CISF का मुख्यालय है और मुख्यालय में सीआईएसएफ के डीजी,आईजी समेत कई वरिष्ठ अधिकारी मौजूद थे।
 

 दिल्ली पुलिस ने की त्यागराज स्टेडियम में योगा

योग दिवस पर दिल्ली पुलिस ने भी योगा की। दिल्ली पुलिस के तकरीबन 2000 पुलिसकर्मियों ने पुलिस कमिश्नर अमुल्य पटनायक के साथ दिल्ली के त्यागराज स्टेडियम में योगा की साथ ही हर डीसीपी ने अपने अपने क्षेत्र में योग दिवस मनाया। आपको बता दें तकरीबन 5.30 बजे से ही पुलिसकर्मी त्यागराज स्टेडियम में आ गए  थे और योग करने लगे थे और 7 बजे से लेकर 8 बजे तक सीपी समेत सभी अधिकारियों ने भी योगा की।  दिल्ली पुलिस के  सभी जिला में भी योग मनाई गई इसमें डीसीपी, एसएचओ,पुलिकर्मी भी मौजूद रहे.और हर दिन योग करने का इस विश्व योगा डे पर संकल्प भी लिया गया।

तिहाड़ जेल में भी 11 हजार कैदियों के साथ प्रशासन ने की योगा
17 जून को बाबा रामदेव तिहाड़ जेल गए थे और उन्होंने 11 हज़ार कैदियों के साथ योगा की थी वहीं 21 जून को विश्व योग दिवस पर भी तकरीबन जेल के सभी कैदियों ने प्रशासन के साथ मिलकर योगा की। इस योगा में कई जज के साथ साथ कई वरिष्ठ अधिकारी, तिहाड़ जेल के एडीजी समेत कई वरिष्ठ अधिकारी थे।
 
दिल्ली सरकार ने नहीं की योग
वहीं इस योग दिवस में दिल्ली सरकार का कोई  मंत्री या विधायक योग करता नज़र नहीं आया, ना ही किसी ने योग दिवस पर अपनी राय रखी। विपक्ष सरकार पर आरोप लगा रहा है कि ना ही आम आदमी पार्टी ने ना ही कांग्रेस ने योग दिवस मनाया।
 
 

 
तेहरान- हज़रत मोहम्मद साहब ने 18 ज़िल्हिज्जा को अरब- गैर अरब के तकरीबन 1 लाख से ज़्यादा लोगों को ग़दीर के मैदान में कहा था कि मैं तुम्हारा आखिरी नबी सव हूँ और मेरे बाद तुम्हारे पहले इमाम अली अस होंगे और इन्ही की 11 औलाद क़यामत तक तुम्हारे साथ रहेंगी।
हज़रत अली अस का नजफ़ इराक में रोज़ा है, दूसरे इमाम हसन अस सऊदी तो इमाम हुसैन अस कर्बला में शहीद हुए। इसी तरह हर इमाम अलग अलग जगह शहीद हुए।
 
लेकिन सिर्फ एक ही इमाम हैं जो ईरान की सरजमीं पर शहीद हुए और वो हैं आठवें इमाम अली रज़ा अस। जी हां या ये कहूँ इनके पैरों के सदके में ही पूरे ईरान में बरकत, खुशहाली और इंसानियत की राह दिखती है। एक भिखारी आपको ईरान में नहीं दिख सकता और न ही कोई आपसे कोई चंदा, ढोंग आदि करता नजर आएगा। 
 
वहीं उनका दस्तरखान इतना बड़ा बिछता है कि सुबह से रात तक 15 हज़ार लोग हर रोज़ पेट भर खाना खा कर जाते हैं।
 
 
 
आइये अब ज़रा इमाम अली रज़ा अस की ज़िंदगी के बारे में बताते हैं आपको
 
आपका नाम अली और लक़ब रज़ा, साबिर, ज़की और वली थाl 11 ज़ीक़ादा सन 148 हिजरी में आपकी विलादत हुई और 23 ज़ीक़ादा या सफ़र की आख़िरी तारीख़ को सन 203 हिजरी में शहादत हुई, आपकी उम्र 55 साल थी।
छठे इमाम जाफ़र सादिक़ अ.स. की शहादत भी उसी 148 हिजरी में 15 या 25 शववाल को हुई यानी इमाम रज़ा अ.स. की विलादत से 15 या 25 दिन पहले हुई, इसीलिए आप फ़रमाया करते थे कि काश मैं अपने बेटे को देख लेता जो आलिमे आले मोहम्मद होग।
ज़ाहिर है कि इस्लामी जगत के सबसे बड़े उस्ताद और चार हज़ार ज़बर्दस्त आलिमों के उस्ताद की तरफ़ से ऐसी उपलब्धि हासिल करना बहुत बड़ी फज़ीलत है जिससे अंदाज़ा होता है कि सात नस्लें गुज़र जाने के बाद भी अली अ.स. के कमाल और उपलब्धियों में फ़र्क़ नहीं आया है, पहला अली इल्म के शहर का दरवाज़ा था तो यह अली भी आलिमे आले मोहम्मद है।
 
 
आपके दौर का हाकिम और ख़ुद को मुसलमानों का ख़लीफ़ा कहने वाला भी आपको ज़मीन पर सबसे बड़ा आलिम कहता था और या सय्येदी कह कर पुकारता था, सन 200 हिजरी में जब उसने आपके उत्तराधिकारी होने का ऐलान किया तो इन शब्दों में किया था कि अली इब्ने मूसा (अ.स.) अफ़ज़ल, आलम और तक़वा वाले हैं इसलिए वह इस पद के ज़्यादा हक़दार हैं और इसी बात पर 33 हज़ार के मजमे के बीच आपकी बैअत का अहद लिया गया था।
इससे पहले आपका इल्म और फ़ज़्ल कुछ ऐसा था कि जब आप नेशापूर से गुज़रे तो 24 हज़ार इल्मे हदीस के माहिर क़लम और दवात लेकर जमा हो गए कि आपसे हदीस नक़्ल करेंगे और आपने एक ख़ास इस्मत के सिलसिले के हवाले से इस हदीस को बयान किया था कि ला इलाहा इल्लल्लाह मेरा क़िला है जो इसमें आ गया वह मेरे अज़ाब से बच गया, इस हदीस के सिलसिले को देख कर इमाम अहमद इब्ने हमबल ने कहा था कि यह सिलसिला अगर किसी पागल और दीवाने पर पढ़ कर दम कर दिया जाए तो उसका पागलपन दूर हो जाएगा।
 
साजिश के तहत शहीद किया इमाम को
हारून रशीद की दो बीवियां थीं एक अरब की थी जिससे अमीन पैदा हुआ और एक कनीज़ जिससे मामून पैदा हुआ, दोनों के बीच बाप के ही ज़माने से सत्ता को लेकर खींचातानी शुरू हो गई थी और एक के साथ अरब वाले हो गए एक के साथ अजम (अरब के अलावा लोग) हो गए जिसकी वजह से हारून ने सत्ता को दो हिस्सों में बांट दिया और दोनों को एक एक हिस्सा दे दिया, लेकिन इसके बाद दोनों भाईयों में जंग हुई और मामून ने जंग जीत ली लेकिन अरबवासियों में विद्रोह शुरू हो गया जिसको दबाने के लिए मामून ने नई चाल चली कि इमाम रज़ा अ.स. को उत्तराधिकारी या बादशाह बना दिया जाए, इसलिए आपको मदीने से बुला कर आपके सामने हुकूमत पेश की, आपने फ़रमाया कि अगर तेरी हुकूमत अल्लाह की ओर से है तो तुझे किसी दूसरे को देने का हक़ नहीं और अगर जनता ने तुझे सत्ता पर बिठाया तो तुझे हुकूमत लेने का हक़ नहीं।
मामून ने मजबूर हो कर उत्तराधिकारी बनने की पेशकश की और दबाव डाला कि यह पद आपको क़ुबूल करना ही होगा वरना आपकी ज़िंदगी ख़तरे में पड़ जाएगी जिसके कारण इमाम अ.स. ने इस पद को इस शर्त पर क़ुबूल किया कि आप हुकूमत के मामलात में दख़लअंदाज़ी नहीं करेंगे।
सात रमज़ान सन 201 हिजरी को मजबूर हो कर उत्तराधिकारी बनने को क़ुबूल किया और एक शव्वाल को मामून ने ईद की नमाज़ पढ़ाने के लिए कहा, जिसके बाद इमाम अ.स. पूरी इमामत की शान के साथ नमाज़ पढ़ाने निकले पूरी फ़ेज़ा तकबीर के नारों से गूंज रही थी, यह सब देख कर मामून ने आपको वापस बुला लिया कि कहीं हुकूमत हाथ से न निकल जाए। 
हर इंसान इमाम को चाहता था और इमाम के साथ लब्बेक कहने लगा जिसे देखकर मामून ने साजिश के तहत इमाम को ज़हर दे दिया और आखिरी में आपकी शहादत हो जाती है। 
 
3 करोड़ लोग आते हैं हर साल 
 
जहां आपको ज़हर दिया गया उस जगह को अब मशहद कहते हैं और वहीं इमाम अली रज़ा अस का रौज़ा भी है। इमाम के रौज़े की ज़्यारत करने के लिए तकरीबन 3 करोड़ से ज़्यादा लोग हर साल पूरी दुनिया से यहां आते हैं। कई एकड़ में इमाम अली रज़ा अस का रौज़ा है। जहाँ पर एक मिनट भी ऐसा नही जाता जब रौज़ा खाली हो। हर वक़्त रौज़ा भरा ही रहता है चाहे दिन हो या रात या पूरे साल। 
 
                    इमाम अली रज़ा अस के दस्तरखान पर खाना खाते हुए ज़ायरीन
 
इमाम रज़ा अस का दस्तरखान, एक निवाले के लिए तरसते हैं लोग
इमाम अली रज़ा अस ने अपनी ज़िंदगी में ही अपने नाना रसूल ए ख़ुदा स व अ की सुन्नत पर चलकर, अपने जद हज़रत अली अस, इमाम हसन अस समेत हर सभी इमाम जैसे ही खुद भी दस्तरखान लगवाते थे जिसमें हर धर्म, हर कोई व्यक्ति आकर खाना खा सकता था। और अब भी इमाम अस के पैरों पर चलते हुए तकरीबन 40 साल से ज़्यादा का वक्त हो गया है यानी जबसे आयतुल्लाह रूहुल्लाह खुमैनी साहब ने ईरान को आज़ादी दिलाई थी तबसे हर दिन यहां तकरीबन 15 हज़ार से ज़्यादा लोग खाना खाते हैं। और खाना भी ऐसा की किसी फाइव स्टार होटल तक मे ऐसा खाना नसीब न हो। इतिहासकार कहते हैं कि खुद गुरु नानक साहब भी मशहद शहर में रहे थे और उन्होंने यहां पर ये दसतरखान लगते हुए देखा था जिसके बाद उन्होंने ने भी हिंदुस्तान में भी लंगर के नाम से खाना खिलाना शुरु किया। साथ ही गरीब नवाज़ साहब ने भी इमाम से ही सिखा था।
 
 
इमाम अली रज़ा अस की औलादों को ही कहते हैं रिज़वी
 
आपके उत्तराधिकारी बनते ही पूरे इस्लामी जगत में आप मशहूर हो गए आपके बाद के इमामों को इब्ने रज़ा के नाम से याद किया जाने लगा बल्कि आपकी औलाद को रिज़वी सादात में शुमार किया जाने लगा, क्योंकि आपकी औलाद में लड़कों में इमाम मोहम्मद तक़ी अ.स. के अलावा कोई और नहीं था इसलिए आपकी औलाद तक़वी या जवादी कही जाने लगी

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पाकिस्तान के प्रधानमंत्री पद के प्रबल दावेदार इमरान खान ने कहा कि उनकी बहुत इच्छा है कि वह ईरान का सफर करें और इस देश की ऐतिहासिक विरासत को निकट से देखें । इमरान खान ने कहा कि क्षेत्र में शांति और स्थायित्व के लिए ईरान के प्रयास बहुत सराहनीय है हम क्षेत्र के बदलते घटनाक्रम को लेकर ईरान की चिंता को अच्छी तरह समझते हैं।  उन्होंने कहा कि हम सऊदी अरब और तेहरान के संबंधों में सुधार लाने के लिए मध्यस्था करने को तैयार हैं।  हम अपने सभी पडोसी देशों के साथ दोस्ताना और मैत्रीपूर्ण संबंध चाहते हैं पाकिस्तान का आर्थिक विकास हमारा पहला उद्देश्य है और हम इस क्षेत्र में ईरान के साथ अपने व्यापारिक संबंधों का फायदा उठाएंगे। 

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ईरान से चाहे कितनी ही इसके विरोधी नफरत कर लें लेकिन इस देश में रहने वाले लोगों को इतनी आसानी से इतनी आज़ादी नही मिली है। नफरत की कई वजह हो सकती हैं। शिया निज़ाम, सऊदी अरब, अमेरिका या इज़रायल से ईरान की दुश्मनी। या फिर सीरिया, यमन, लेबनान, अफ़ग़ानिस्तान, फिलिस्तीन, और ईराक़ में ईरान की फौजी मौजूदगी।

अपनी नफरत के पर्दे को एक मिनट के लिए हटाकर इन छह तस्वीरों को एक नज़र देखेंगे तो नफरत की दीवार के पार अपने पैरों पर खड़े मुसलमान और दुनिया की सबसे बड़ी साम्राज्यवादी ताक़तों को ललकारते नौजवान भी हैं। दुश्मनी भरे घर के आंगन में आत्मसम्मान और थोड़ा सा गर्व महसूस करना है तो इन्हें ज़रूर देखिए।

इनमें दो तस्वीरें तेहरान के मौहल्ला जमारान की एक तंग गली और दूसरी उसमें बने एक कमरे के स्टूडियों अपार्टमेन्ट नुमा घर की हैं। इस घर में ईरानी क्रांति के बाद इस क्रांति का नेता रहा करता था।

एक तस्वीर अमेरिकी एम्बेसी की है। इसपर क्रांति के बाद ईरानी छात्रों ने क़रीब 450 दिन क़ब्ज़ा रखा। आज ये साम्राज्यवाद के ख़िलाफ दुनिया भर के संघर्ष का एक बड़ा प्रतीक है।

एक तस्वीर तेहरान की शहरी हद से थोड़ा दूर बने क़ब्रिस्तान बहिश्ते ज़ैहरा की है। इस क़ब्रिस्तान में दो लाख से ज़्यादा शहीद रहते हैं जिन्होंने ईरानी क्रांति, ईरान-इराक़ युद्ध, लेबनान, सीरिया, यमन, अफ़ग़ानिस्तान में संघर्ष के अलावा दुनिया के अलग अलग हिस्सों में इज़रायल या अमेरिकी ख़ुफिया तंत्र/सेना के हाथों जान गंवाई है।

इसमें लाखों गुमनाम शहीद हैं जिनकी क़ब्र पर फरज़ंदे रूहअल्ला यानि रुहअल्ला ख़ुमैनी के बेटे लिखा है। एक आज़ादी स्क्वायर है यानि क्रांति की यादगार।

और एक तस्वीर उस शख़्स की घर वापसी की भी है जिसे अमेरिकी समर्थन वाली सरकार ने घर से बेघर कर दिया था। 15 साल बाद जब ये शख़्स लौट कर आया तो ईरान ही नहीं दुनिया की तारीख़ में कई नए अध्याय जुड़ गए।

(यह लेख वरिष्ठ पत्रकार ज़ैग़म मुर्तज़ा ने अपनी फेसबुक प्रोफाइल पर लिखा है)

 

 विशेष संवाददाता,तेहरान - कई देश मे भुखमरी, बेरोज़गारी की वजह से कई लोग परेशान रहते हैं जिसकी वजह से उनकी मौत तक हो जाती है। ऐसे में ईरान ने अपने देश के हर यतीम, बेसहारा मज़लूम लोगों की मदद के लिए इमाम खुमैनी रिलीफ फण्ड शुरू किया हुआ है जिससे इस देश मे कोई भीख नहीं मांगता और न ही किसी को परेशान होने की ज़रूरत होती। साथ ही ईरान इस फण्ड से दुनियाभर के मज़लूमों की भी मदद करता है। आइये बताते हैं आपको आखिर ये किस तरह काम करता है और कौन कौन से देश में इससे मदद दी जा रही है।

 

इमाम खुमैनी ने शुरू किया था ये इदारा

ईरान में इस्लामिक क्रांति के बाद आयतुल्लाह खुमैनी के ज़रिए ये एक इदारा बनाया गया। जिसका नाम इमाम खुमैनी रिलीफ फंड के नाम से रखा गया आपको बता दें इसके जरिए पूरे ईरान में हर एक गली, मोहल्ले,बस स्टैंड, रेलवे स्टेशन हवाई अड्डा समेत मस्जिद, स्कूल, कॉलेज इंस्टिट्यूट आदि सभी के बाहर लाखों की तादात में रिलीफ फण्ड के नाम के बॉक्स लगाए गए हैं।जिसमें हर रोज इरान की जनता दान सदका, ख़ुम्स आदि डालती रहती है।

क्या होता है इन फंड का

इमाम खुमैनी रिलीफ फंड के ज़रिए गरीब,यतीम , दिव्यांग,विधवा आदि की मदद के लिए इसकी शुरुआत की गई थी। इसे अब तक 40 साल होने वाले हैं। शुरुआत में बॉक्स में आई रकम से उन्हें खाना, पीना,रहने आदि की सुविधा दी जा रही थी जिसके साथ ही उन्हें अपने पैरों पर खड़े होने, उन्हें रोज़गार और तालीम दिलाने के लिए कदम बढ़ाया जाता है। जिससे हर एक व्यक्ति पढ़ाई लिखाई के साथ साथ रोज़गार भी पा सके जिससे उसे गरीबी का मुंह नही देखना पड़े और न ही कभी भूखा सोना पड़े। ज़्यादातर इसमें वो यतीम, बेसहारा लोग होते हैं जिनके सर से उनके हमसाये का सहारा नही रहता है साथ ही वो विधवा महिलाएं भी होती हैं जिनके पति का निधन हो चुका होता है। उन महिलाओं को हर महीने अच्छी मदद भी दी जाती है।

 

40 लाख लोगों को मिल रहा है फायदा

इमाम खुमैनी रिलीफ फंड के जरिए  तकरीबन 15 लाख परिवार के 40 लाख लोगों को फायदा पहुंचाया जा रहा है। जिसमें 60 फीसदी महिलाओं की तादात है इनमें विधवा, तलाकशुदा आदि महिलाएं हैं। साथ ही ईरान में रहने वालों को तो मदद दी ही जाती है। साथ ही अगर कहीं किसी को देश के बाहर भी परेशानी आती है यो IKRF उनकी भी मदद करता है। साथ ही आपदा,जंग आदि में भूखे, बेसहारा, आदि लोगों को खाना पीना समेत कई तरह से मदद की जाती है।

 

विदेश में कैसे करता है मदद

ईरान के लोगों के साथ साथ  यह  इदारा विदेशों में भी अगर किसी को परेशानी होती है तो उनकी भी मदद करता है कुछ साल पहले आये पाकिस्तान में भूकंप और सैलाब के वक़्त भी पाकिस्तान को मदद पहुंचाई गई थी। साथ ही अफगानिस्तान, इराक सीरिया और लेबनॉन आदि में इसके जरिये मदद पहुंचाते हैं। यहां तक कि 2 बार हिन्दुस्तान में भी मदद की है।

 

 कैसे आता है IKRF के पास फंड

IKRF का मकसद यही होता है कि जो भी मज़लूम बेकस हो उसे हम रोज़गार के साथ साथ उसकी जरूरत पूरा करें और उसके बाद उसकी जॉब लग जाये।इस फंड को सरकार, आम जनता,और उद्यमियों के ज़रिए चलाया जा रहा है। सरकार हर साल इसका मोटा बजट भी बनाती है। वहीं सड़क पर बॉक्स लगे हैं जिसमें सदक़ा, ख़ुम्स, ज़कात आदि से आता है और जो फैक्ट्री,आदि के मालिक होते हैं वो भी इसमें मदद करते हैं। वहीं ऑनलाइन इमाम खुमैनी रिलीफ फंड की वेबसाइट के ज़रिए भी ऑनलाइन डोनेशन कर सकते हैं।

V.o.H News: शहज़ाद आब्दी


 

मुख्य कार्यालय: ईरान 8 जून जुमे के दिन तेहरान, इसफहान, मशद, क़ुम, शीराज़, तबरेज जैसे 800 से अधिक शहरों में एक साथ अंतर्राष्ट्रीय कुदस दिवस मनाया गया। जिसमें शिया समुदाय और दूसरे समुदायों के धर्मगुरुओं ने बढ़ चढ़ कर हिस्सा लेकर फिलिस्तीनी मजलूमों की हिमायत में ईरानी जनता के साथ पैदल मार्च की धर्मगुरुओं के अलावा बड़े राजनेता भी नजर आए और अमेरिका इसराइल मुर्दाबाद के नारे लगाए।

V.o.H News, शहजाद आब्दी 


फिलिस्तीन पर अवैध ज़ायोनी क़ब्ज़े के 70 वर्ष बीत जाने तथा क़ुद्स को अवैध राष्ट्र की राजधानी के रूप में मान्यता देकर अमेरिकी दूतावास को क़ुद्स स्थान्तरित करने के फैसले के विरुद्ध प्रदर्शन कर रहे फिलिस्तीनी लोगों पर ज़ायोनी सेना की गोलीबारी पर चिंता व्यक्त करते हुए यूनिसेफ ने इन हमलों में घायल हुए बच्चों की भारी संख्या को लेकर चिंता जताई है