दुनिया के सर्वोच्च मुस्लिम धर्मगुरुओं ने कोरोना से बचने के लिए क्या दिए फतवे

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सैय्यद ग़ाफ़िर रिज़वी-  जिस वक़्त से दुनिया में कोरोना नामी वबा आम हुई और लॉकडाउन का सिलसिला शुरू हुआ उसी वक़्त से जहां इंजीनियर, डॉक्टर, वकील, जज, पुलिस सब परेशान हैं वहीं इस वबा से ओलामाए आलाम भी परेशान हैं...क्योंकि ये वबा ना तो किसी का मज़हब पूछती है और ना किसी के मनसब का ख़्याल करती है.. लॉकडॉउन के हालात में मंज़र पर आने वाले अफ़राद पसमंजर में नज़र आने लगे, क्या किसी ने ये सोचा था कि एक ऐसा भी ज़माना आएगा कि ऑलामा हज़रात को दीने इस्लाम की तबलीग़ ऑनलाइन करना होगी?  क्या किसी ने ये सोचा था कि मिंबरों पर दहाड़ने वाले शेर गोशा नशीनी का शिकार हो सकते हैं?

हरगिज़ नहीं... ये सोचा भी नहीं जा सकता था लेकिन ऐसा ज़माना भी आ गया कि कोरोना ने सब को गोशा नाशीनी पर मजबूर कर दिया ..

कोई परहेज़ करे या ना करे, कोई कोरोना का यकीन करे या ना करे लेकिन हकीकत ये है कि कोरोना नाम की वबा ने पूरी दुनिया में अपने पंजे गाड़ लिए हैं जिस के सामने बड़े से बड़ा डॉक्टर घुटने टेकने पर मजबूर है.. इन सब बातों से ये समझ में आता है कि अगर इस वबा को कोई ख़त्म कर सकता है तो वो सिर्फ़ ख़ुदा की ज़ात है..जहां इंसान के तायेरे फिक्र कि परवाज़ ख़त्म हो जाती है वहां से तदबीरे इलाही का आग़ाज़ होता है..इस तनाज़ुर में ओलमाए आलाम ने जो बयानात दिए हैं उन में से कुछ की तरफ़ इशारा करना ज़रूरी समझता हूं..

 

 

 

1- रेहबरे मोअज़्ज़म आयतुल्लाह खामेनेई: कोरोना जैसी ख़तरनाक बीमारी से बचने के लिए मैं भी मास्क लगाता हूं और सब को मास्क लगाने का हुक्म देता हूं कि सब मास्क लगाएं.. हमारे वो डॉक्टर्स और वो नर्सें जो मास्क ना लगाने कि वजह से अल्लाह को प्यारे होना चाहते हैं, मैं उन से हरगिज़ राज़ी नहीं हूं. हमें किसी भी सूरत एहतियाती तदाबीर का दामन नहीं छोड़ना है..

 

2- आयतुल्लाह सैयद अली हुसैनी सीस्तानी: हमें इस ख़तरनाक बीमारी (कोरोना) से बचने के लिए डॉक्टर्स और हुकूमतों के ओहदेदारों की बातों पर अमल करना चाहिए क्योंकि ऐसे माहौल में इन लोगों की बातें भरोसे के काबिल हैं..

 

3- आयतुल्लाह नासिर मकारिम शीराज़ी: अगर हम यह जानते हैं के हमे कोरोनावायरस हो गया है और हम जान बूझ कर अपने किसी भाई से हाथ मिलाते हैं और वो भाई उस की वजह से मर जाता है तो इस्लाम की नज़र में उसके ख़ून के ज़िम्मेदार हम होंगे..

 

4- आयतुल्लाह साफी गुलपाएगानी: जब आयतुल्लाह साफी गुल्पाएगानी से पूछा गया कि ऐसे माहौल (कोरोनावायरस) में हम मोहर्रम कैसै मनाएं? तो आप ने जवाब दिया: इमाम हुसैन अ. स. की अज़ादारी एक पसंदीदा चीज़ है और इस को होना चाहिए लेकिन ऐसे माहौल में(कोरोनावायरस के चलते) डॉक्टर्स की सलाह पर अमल करते हुए मोहर्रम मनाना चाहिए..

 

5- अल्लामा सैयद हसन नसरूल्लाह: कोरोनावायरस एक जंग है जिस में हमें कामयाब होना है, इस जंग में कामयाबी का वाहिद रास्ता यह है कि हम एहतियाती तदबीर पर अमल करें, जितना ज़ियादा हम एहतियाती तदबीर पर अमल करेंगे इतनी ही जल्दी इस जंग में कामयाब होंगे..

 

 

गौर करने की बात यह है कि हमने जितने भी बयानात लिखे हैं उन सब से यही समझ में आता है कि अगर कोरोनावायरस के दौर में हम महफूज़ रहना चाहते हैं तो डॉक्टर्स के मशवरों पर अमल और एहतियाती तदबीर पर अमल करना पड़ेगा।

इसमें कोई शक नहीं कि हर इंसान को अपनी जान प्यारी होती है यहां तक कि जानवरों को भी अपनी जान से प्यार होता है तो ऐसी सूरत में अक्ल का तकाज़ा यही है कि अगर हमें अपनी जान प्यारी है तो हमारे हाथों से एहतियाती तदबीर का दामन कभी नहीं कूटना चाहिए।

"वस्सलामो अला मनित्तबा अल हुदा"

(लेखक मौलाना सैय्यद ग़ाफ़िर रिज़वी हैं )

 

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