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तेहरान- हज़रत मोहम्मद साहब ने 18 ज़िल्हिज्जा को अरब- गैर अरब के तकरीबन 1 लाख से ज़्यादा लोगों को ग़दीर के मैदान में कहा था कि मैं तुम्हारा आखिरी नबी सव हूँ और मेरे बाद तुम्हारे पहले इमाम अली अस होंगे और इन्ही की 11 औलाद क़यामत तक तुम्हारे साथ रहेंगी।
हज़रत अली अस का नजफ़ इराक में रोज़ा है, दूसरे इमाम हसन अस सऊदी तो इमाम हुसैन अस कर्बला में शहीद हुए। इसी तरह हर इमाम अलग अलग जगह शहीद हुए।
 
लेकिन सिर्फ एक ही इमाम हैं जो ईरान की सरजमीं पर शहीद हुए और वो हैं आठवें इमाम अली रज़ा अस। जी हां या ये कहूँ इनके पैरों के सदके में ही पूरे ईरान में बरकत, खुशहाली और इंसानियत की राह दिखती है। एक भिखारी आपको ईरान में नहीं दिख सकता और न ही कोई आपसे कोई चंदा, ढोंग आदि करता नजर आएगा। 
 
वहीं उनका दस्तरखान इतना बड़ा बिछता है कि सुबह से रात तक 15 हज़ार लोग हर रोज़ पेट भर खाना खा कर जाते हैं।
 
 
 
आइये अब ज़रा इमाम अली रज़ा अस की ज़िंदगी के बारे में बताते हैं आपको
 
आपका नाम अली और लक़ब रज़ा, साबिर, ज़की और वली थाl 11 ज़ीक़ादा सन 148 हिजरी में आपकी विलादत हुई और 23 ज़ीक़ादा या सफ़र की आख़िरी तारीख़ को सन 203 हिजरी में शहादत हुई, आपकी उम्र 55 साल थी।
छठे इमाम जाफ़र सादिक़ अ.स. की शहादत भी उसी 148 हिजरी में 15 या 25 शववाल को हुई यानी इमाम रज़ा अ.स. की विलादत से 15 या 25 दिन पहले हुई, इसीलिए आप फ़रमाया करते थे कि काश मैं अपने बेटे को देख लेता जो आलिमे आले मोहम्मद होग।
ज़ाहिर है कि इस्लामी जगत के सबसे बड़े उस्ताद और चार हज़ार ज़बर्दस्त आलिमों के उस्ताद की तरफ़ से ऐसी उपलब्धि हासिल करना बहुत बड़ी फज़ीलत है जिससे अंदाज़ा होता है कि सात नस्लें गुज़र जाने के बाद भी अली अ.स. के कमाल और उपलब्धियों में फ़र्क़ नहीं आया है, पहला अली इल्म के शहर का दरवाज़ा था तो यह अली भी आलिमे आले मोहम्मद है।
 
 
आपके दौर का हाकिम और ख़ुद को मुसलमानों का ख़लीफ़ा कहने वाला भी आपको ज़मीन पर सबसे बड़ा आलिम कहता था और या सय्येदी कह कर पुकारता था, सन 200 हिजरी में जब उसने आपके उत्तराधिकारी होने का ऐलान किया तो इन शब्दों में किया था कि अली इब्ने मूसा (अ.स.) अफ़ज़ल, आलम और तक़वा वाले हैं इसलिए वह इस पद के ज़्यादा हक़दार हैं और इसी बात पर 33 हज़ार के मजमे के बीच आपकी बैअत का अहद लिया गया था।
इससे पहले आपका इल्म और फ़ज़्ल कुछ ऐसा था कि जब आप नेशापूर से गुज़रे तो 24 हज़ार इल्मे हदीस के माहिर क़लम और दवात लेकर जमा हो गए कि आपसे हदीस नक़्ल करेंगे और आपने एक ख़ास इस्मत के सिलसिले के हवाले से इस हदीस को बयान किया था कि ला इलाहा इल्लल्लाह मेरा क़िला है जो इसमें आ गया वह मेरे अज़ाब से बच गया, इस हदीस के सिलसिले को देख कर इमाम अहमद इब्ने हमबल ने कहा था कि यह सिलसिला अगर किसी पागल और दीवाने पर पढ़ कर दम कर दिया जाए तो उसका पागलपन दूर हो जाएगा।
 
साजिश के तहत शहीद किया इमाम को
हारून रशीद की दो बीवियां थीं एक अरब की थी जिससे अमीन पैदा हुआ और एक कनीज़ जिससे मामून पैदा हुआ, दोनों के बीच बाप के ही ज़माने से सत्ता को लेकर खींचातानी शुरू हो गई थी और एक के साथ अरब वाले हो गए एक के साथ अजम (अरब के अलावा लोग) हो गए जिसकी वजह से हारून ने सत्ता को दो हिस्सों में बांट दिया और दोनों को एक एक हिस्सा दे दिया, लेकिन इसके बाद दोनों भाईयों में जंग हुई और मामून ने जंग जीत ली लेकिन अरबवासियों में विद्रोह शुरू हो गया जिसको दबाने के लिए मामून ने नई चाल चली कि इमाम रज़ा अ.स. को उत्तराधिकारी या बादशाह बना दिया जाए, इसलिए आपको मदीने से बुला कर आपके सामने हुकूमत पेश की, आपने फ़रमाया कि अगर तेरी हुकूमत अल्लाह की ओर से है तो तुझे किसी दूसरे को देने का हक़ नहीं और अगर जनता ने तुझे सत्ता पर बिठाया तो तुझे हुकूमत लेने का हक़ नहीं।
मामून ने मजबूर हो कर उत्तराधिकारी बनने की पेशकश की और दबाव डाला कि यह पद आपको क़ुबूल करना ही होगा वरना आपकी ज़िंदगी ख़तरे में पड़ जाएगी जिसके कारण इमाम अ.स. ने इस पद को इस शर्त पर क़ुबूल किया कि आप हुकूमत के मामलात में दख़लअंदाज़ी नहीं करेंगे।
सात रमज़ान सन 201 हिजरी को मजबूर हो कर उत्तराधिकारी बनने को क़ुबूल किया और एक शव्वाल को मामून ने ईद की नमाज़ पढ़ाने के लिए कहा, जिसके बाद इमाम अ.स. पूरी इमामत की शान के साथ नमाज़ पढ़ाने निकले पूरी फ़ेज़ा तकबीर के नारों से गूंज रही थी, यह सब देख कर मामून ने आपको वापस बुला लिया कि कहीं हुकूमत हाथ से न निकल जाए। 
हर इंसान इमाम को चाहता था और इमाम के साथ लब्बेक कहने लगा जिसे देखकर मामून ने साजिश के तहत इमाम को ज़हर दे दिया और आखिरी में आपकी शहादत हो जाती है। 
 
 
3 करोड़ लोग आते हैं हर साल 
 
जहां आपको ज़हर दिया गया उस जगह को अब मशहद कहते हैं और वहीं इमाम अली रज़ा अस का रौज़ा भी है। इमाम के रौज़े की ज़्यारत करने के लिए तकरीबन 3 करोड़ से ज़्यादा लोग हर साल पूरी दुनिया से यहां आते हैं। कई एकड़ में इमाम अली रज़ा अस का रौज़ा है। जहाँ पर एक मिनट भी ऐसा नही जाता जब रौज़ा खाली हो। हर वक़्त रौज़ा भरा ही रहता है चाहे दिन हो या रात या पूरे साल। 
 
इमाम रज़ा अस का दस्तरखान, एक निवाले के लिए तरसते हैं लोग
इमाम अली रज़ा अस ने अपनी ज़िंदगी में ही अपने नाना रसूल ए ख़ुदा स व अ की सुन्नत पर चलकर, अपने जद हज़रत अली अस, इमाम हसन अस समेत हर सभी इमाम जैसे ही खुद भी दस्तरखान लगवाते थे जिसमें हर धर्म, हर कोई व्यक्ति आकर खाना खा सकता था। और अब भी इमाम अस के पैरों पर चलते हुए तकरीबन 40 साल से ज़्यादा का वक्त हो गया है यानी जबसे आयतुल्लाह रूहुल्लाह खुमैनी साहब ने ईरान को आज़ादी दिलाई थी तबसे हर दिन यहां तकरीबन 15 हज़ार से ज़्यादा लोग खाना खाते हैं। और खाना भी ऐसा की किसी फाइव स्टार होटल तक मे ऐसा खाना नसीब न हो। इतिहासकार कहते हैं कि खुद गुरु नानक साहब भी मशहद शहर में रहे थे और उन्होंने यहां पर ये दसतरखान लगते हुए देखा था जिसके बाद उन्होंने ने भी हिंदुस्तान में भी लंगर के नाम से खाना खिलाना शुरु किया। साथ ही गरीब नवाज़ साहब ने भी इमाम से ही सिखा था।
 
इमाम अली रज़ा अस की औलादों को ही कहते हैं रिज़वी
 
आपके उत्तराधिकारी बनते ही पूरे इस्लामी जगत में आप मशहूर हो गए आपके बाद के इमामों को इब्ने रज़ा के नाम से याद किया जाने लगा बल्कि आपकी औलाद को रिज़वी सादात में शुमार किया जाने लगा, क्योंकि आपकी औलाद में लड़कों में इमाम मोहम्मद तक़ी अ.स. के अलावा कोई और नहीं था इसलिए आपकी औलाद तक़वी या जवादी कही जाने लगी