एक बस्ती ऐसी भी- देश पर 18 मुसलमानों ने दी थी जान, परिजनों को सरकार से नहीं मिलती कोई सुविधा

उत्तर प्रदेश
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रिपोर्ट:  शहजाद आब्दी यहाँ क्लिक कर हमारा फेसबुक पेज लाइक करें

नौगावां सादात/अमरोहा। उत्तर प्रदेश में नौगावां सादात शिया बस्ती किसी मिसाल से कम नहीं है। बस्ती की करीब साठ हजार की आबादी   शराब से दूर है। बस्ती में आज तक न कोई शराब की दुकान है न पीने वाले। यही नहीं कोई सिनेमाघर भी नहीं है। पूरी बस्ती सौ साल पहले लागू हुए एक बॉयलाज पर कायम है। नौगावां सादात बस्ती के इतिहास के कुछ दस्तावेज बताते हैं कि 1917 में वकील शोबी रज़ा के परदादा  पूर्व चेयरमैन हाजी अलमदार अली के प्रयास से एक बॉयलाज तैयार किया गया था।

इसमें सबसे पहले बस्ती को शराब से दूर रखने का जिक्र है। उस वक्त जो बातें तय हुईं और बॉयलाज में दर्ज की गईं उनमें सबसे ऊपर शराब की बुराई दूर करने की थी। करीब सौ साल पूरे होने के बाद अब नौगावां सादात की आबादी 60 हजार के आसपास पहुंच चुकी है। बस्ती के लोगों में भले ही किसी बात पर मतभेद हो जाएं लेकिन सौ साल पुराना बॉयलाज जैसे का तैसा लागू है।अभी तक बस्ती में सरकार कोई शराब की दुकान भी नहीं खोल सकी है। बस्ती के लोग शराब से दूर भी हैं। यदि कोई शराब पीएगा तो बस्ती उस से अपना वास्ता ख़त्म कर देगी।

 इसी बॉयलाज में सिनेमाघर ना खोले जाने का भी जिक्र है। इसीलिए सौ साल में इतनी बड़ी बस्ती में कोई सिनेमाघर भी नहीं खुला है।  जानकारी हासिल करने से पता चलता है कि  यहां का गौरवशाली इतिहास रहा है। जंगे आजादी में भी बस्ती के बहुत लोग शहीद हुए हैं। इस बॉयलाज को लागू करके सौ साल तक कायम रखा जाते रहना भी एक मिसाल है। लोग बॉयलाज पर कायम हैं। इससे साफ झलकता है कि बस्ती में रहने वालों के खून में कुछ तो खासबात है। बॉयलाज में यह भी नियम शामिल है कि नौगावां सादात बस्ती में कोई कालगर्ल नहीं रह सकती।

कोई भी ऊंट या हाथी की सवारी बिना अनुमति के नहीं कर सकता। कोई भी पुरुष घर की छत पर चढ़ेगा तो तीन बार आवाज देकर ही छत पर कदम रखेगा। सिनेमाघर नहीं खोला जाएगा। 

नगर पंचायत और थाने में दर्ज है बॉयलाज नौगावां सादात का बॉयलाज नगर पंचायत कार्यालय और थाने में दर्ज है। कोई भी नियम तोड़ने की कोशिश करता है तो उसके खिलाफ कार्रवाई भी हो सकती है। लेकिन अभी तक ऐसा कोई मामला सामने नहीं आया है। पूरी बस्ती इस बॉयलाज पर कायम है। 

क्यों बना यह नियम नौगावां सादात बस्ती में 80 फीसदी परिवार शिया समुदाय से हैं। बाकी में और लोग हैं। 1917 में हाजी अलमदार अली जोकि तहसीलदार थे उन्होंने  इस बॉयलाज को तैयार कराने में मुख्य भूमिका अदा की थी। हाजी अलमदार अली 1933 से 38 तक नौगावां नगर पंचायत के चेयरमैन भी रहे।  

बायलाज़ बनाने के पीछे सीधा मकसद था कि बस्ती की अच्छाइयां दूर दूर तक जाएं और लोग अमल करें। 

बदले जमाने में परंपरा कायम जमाना भले ही बदल गया हो, शादी ब्याह में शराब परोसी जाने लगी हो। लोग शराब के आदी हो गए हों, लेकिन नौगावां सादात बस्ती पर इस बदले जमाने का कोई असर नहीं पड़ा है, कुछ लोग इस दुर्व्यसन से जुड़ भी गए होंगे तो बस्ती से दूर रहने लगे हैं या बस्ती छोड़कर चले गए हैं। हालांकि बस्ती के आसपास के गांवों में शराब की दुकानें खुली हैं। लेकिन बस्ती के लोगों को उसके आसपास नहीं देखा जाता।

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