जल्द ही ईरान हथियार बेचने और ख़रीदने के लिए होगा आज़ाद, इस्राईल और अमरीका की बढ़ी 'बैचैनी'

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2015 में ईरान ने संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में वीटो अधिकार रखने वाले 5 देशों सहित जर्मनी के साथ परमाणु समझौता किया था। समझौते के अनुसार ईरान को अपने परमाणु कार्यक्रम को सीमित करना था

जिसके बदले ईरान पर लगे संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद के प्रतिबंधों को हटा लिया गया और 5 साल बाद यानी अक्तूबर 2020 में हथियारों के प्रतिबंधों को भी हटा लेने का प्रावधान रखा गया।

हालांकि मई 2018 में अमरीका एक पक्षीय रूप से इस समझौते से निकल गया और उसने ईरान पर फिर से कड़े प्रतिबंध लगा दिए थे। लेकिन अब अमरीका इस कोशिश में है कि किसी तरह ईरान पर राष्ट्र संघ के हथियारों के प्रतिबंधो को हटने से रोक ले। इसके लिए अमरीका ऐसे क़ानूनी उपाय भी खोज रहा है कि अगर संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में उसके प्रयास नाकाम हो जाएं तो वह यह साबित कर सके कि वाशिंगटन अभी भी परमाणु समझौते में बना हुआ है। ताकि इस समझौते में शामिल एक पक्ष के रूप में विशेष अधिकारों का प्रयोग करते हुए ईरान के ख़िलाफ़ लगे राष्ट्र संघ के प्रतिबंधों को आगे बढ़वा सके।विशेषज्ञों का मानना है कि ट्रम्प प्रशासन कहीं रूख के चक्कर में असल भी नहीं गवां बैठे, इसलिए कि इन हरकतों से जहां उसके पारम्परिक पश्चिमी सहयोगी आहत हैं, वहीं दुनिया में अमरीका पहले से भी अधिक अलग थलग पड़ जाएगा।

ईरान का कहना है कि अमरीका अब केवल लकीर पीट रहा है और अक्तूबर के बाद वह हथियारों के निर्यात और आयात के लिए पूरी तरह से आज़ाद होगा।

राष्ट्र संघ के प्रतिबंध हटने के बाद, ईरान रूस और चीन जैसे अपने सहयोगी देशों से लड़ाकू विमान, हेलिकॉप्टर, टैंक और अन्य सैन्य उपकरण ख़रीद सकता है, जिससे उसकी सैन्य शक्ति में अभूतपूर्व वृद्धि होगी। वहीं ईरान अपने सहयोगियों को महत्वपूर्ण सैन्य उपकरण और तकनीक बेचने के लिए भी आज़ाद होगा।

अमरीका ने ईरान में इस्लामी क्रांति की सफलता के बाद ईरान-इराक़ युद्ध के दौरान तेहरान पर एकपक्षीय रूप से हथियारों का प्रतिबंध लगा दिया था।

2016 में अंतरराष्ट्रीय परमाणु ऊर्जा एजेंसी ने ईरान की परमाणु फ़ाइल को संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में भेज दिया था, जिसके बाद सुरक्षा परिषद ने ईरान पर कई तरह के प्रतिबंधों के साथ ही परमाणु हथियारों के बेचने और ख़रीदने पर भी प्रतिबंध लगा दिया था।

तेहरान के लिए जहां तक वाशिंगटन की दुश्मनी का सवाल है, तो यह स्पष्ट है कि अमरीका की हर रणनीति ईरान को झुकाने या उसके बढ़ते क़दमों को रोकने में बुरी तरह से नाकाम हो गई है। ट्रम्प प्रशासन की अधिकतम दबाव की नीति के दौरान, ईरान ने सामरिक और वैज्ञानिक स्तर पर कई कीर्तिमान दर्ज किए हैं, जिसमें सबसे महत्वपूर्ण पिछले हफ़्ते सैन्य उपग्रह को सफलतापूर्वक अंतरिक्ष में लॉन्च करना है। इसलिए ईरान से राष्ट्र संघ के प्रतिंबंधों के हटने के बाद ईरान की सैन्य शक्ति में आने वाली क्रांति से अमरीका और इस्राईल का भयभीत होना स्वाभाविक है। (parstoday)

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