अमरीकी पत्रिका ने दिया रोचक सुझाव, कहा 'ईरान अमरीका युद्ध रोकना है तो इराक़ को फिनलैंड बना दिया जाए'

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अलबर्ट वुल्फ ने फॉरेन पॉलिसी में लिखा है कि कोरोना पूरी दुनिया में फैल रहा है और अमरीकी लॉकडाउन खत्म करने की चिंता में हैं लेकिन इन हालात में भी यह लग रहा है कि अमरीकी सांसद इस विषय पर सहमत हैं कि ईरान पर हथियारों के प्रतिबंध की अवधि बढ़नी चाहिए।

 

ईरान के खिलाफ ट्रम्प की जो अधिकतम दबाव की नीति है वह खुद एक खतरनाक चीज़ है क्योंकि यह आशंका है कि ट्रम्प अपनी इस नीति से अमरीका को मध्य पूर्व में एक अन्य युद्ध में ढकेल दें।

जिस तरह से ईरान में सरकार बदलने के लिए दबाव डाला जा रहा है, तेहरान के आर्थित स्रोत खत्म किये जा रहे हैं उन्हें देखते हुए इस बात की आशंका बढ़ गयी है कि ईरान, अमरीकी सैनिकों पर हमला कर दे। बल्कि यह भी हो सकता है कि फार्स की खाड़ी में घटी उस घटना की तरह जिसमें आईआरजीसी की गनबोट्स अमरीकी युद्धपोत के निकट हो गयी थीं, कोई अन्य घटना घटे और उसके परिणाम में युद्ध की आग भड़क उठे।

अमरीका और ईरान, इराक़ को फिनलैंड बनाने पर सहमत होकर इस प्रकार के किसी संभावित युद्ध से बड़ी आसानी से बच सकते हैं। इराक़ को, शीतयुद्ध के दौरान निष्पक्ष रहने वाले फिनलैंड की तरह बनाया जा सकता है और इस तरह से इराक़, ईरान और अमरीका दोनों के प्रभाव से दूर हो जाएगा।

इस बात की संभावना है कि ट्रम्प की सरकार को यह चिंता हो कि ईरान, इराक़, सीरिया और लेबनान में अपने घटकों को नये नये हथियार दे दे और इसके साथ ही परमाणु हथियारों की ओर भी क़दम बढ़ा दे लेकिन इस इलाक़े में पूर्ण रूप से परमाणु शक्ति से संपन्न ईरान की राह रोकना कोई आसान काम नहीं होगा। अलबत्ता यह भी नहीं भूलना चाहिए कि ईरान की अर्थ व्यवस्था, तेल की क़ीमत में कमी और प्रतिबंधों की वजह से कमज़ोर हो गयी है और अगर प्रतिबंध हट भी गये तब भी ईरान के लिए हथियारों की खरीदारी आसान नहीं होगी। इसके अलावा भी मौजूदा हालात में न केवल यह कि ईरान परमाणु हथियारों से बहुत दूर है बल्कि फिलहाल वह अपनी बैलेस्टिक मिसाइलों में परमाणु शस्त्र भी नहीं लगा सकता।

ईरान व अमरीका के संबंध हमेशा से खराब रहे लेकिन मई 2018 में परमाणु समझौते से ट्रम्प के निकलने के बाद मतभेद बढ़ गये और जनवरी 2020 में जनरल कासिम सुलैमानी की हत्या के बाद हालात काफी खराब हो गये।

इस समय ईरान और अमरीका के बीच तनाव कम करने का सब से अच्छा रास्ता इराक़ को फिनलैंड बनाना है। दूसरे विश्व युद्ध के आरंभ से कुछ दिनों बाद सोवियत संघ ने फिनलैंड से मांग की कि वह अपनी भूमि का बड़ा भाग, लेनिनग्रेड की सुरक्षा के लिए मास्को को दे दे।  फिनलैंड ने सोवियत संघ की यह मांग नहीं मानी और युद्ध करना स्वीकार कर लिया जिसके तत्काल बाद, सोवियत संघ ने फिनलैंड पर हमला कर दिया।

यह युद्ध तीन महीने से थोड़ा अधिक समय तक जारी रहा जिसके दौरान सोवियत संघ को काफी जानी नुक़सान हुआ। इसी लिए उन्होंने सन 1940 की संधि में अपनी बहुत सी मांगे छोड़ दीं और सन 1948 से फिनलैंड को औपचारिक रूप से निष्पक्ष देश स्वीकार कर लिया गया। फिनलैंड और सोवियत संघ ने इस बात पर सहमति की कि फिनलैंड किसी भी गठबंधन का हिस्सा नहीं बनेगा जिसके बदले मास्को ने भी यह वचन दिया कि वह फिनलैंड की स्वाधीनता और प्रजातंत्र का सम्मान करेगा। इसके बाद अमरीका, सोवियत संघ, ब्रिटेन और फ्रासं ने भी आस्ट्रिया के बारे में इसी प्रकार की सहमति की।

इसी लिए यह कहा जा रहा है कि ईरान और अमरीका, इराक़ के बारे में इस बात पर सहमत हों कि यह देश एक निष्पक्ष देश के रूप में स्वीकार कर लिया जाए जैसा कि अमरीका और सोवियत संघ ने शीत युद्ध के दौरान फिनलैंड और आस्ट्रिया के बारे में समझौता किया था। यह शैली इन देशों और इसी तरह स्वीटज़रलैंड और स्वीडन के लिए लाभदायक रही है। आज बहुत से विश्लेषक यह कह हरे हैं कि ताइवान, पूर्वी युरो और कफक़ाज़ जैसे क्षेत्रों के लिए भी इसी प्रकार के समझौते होने चाहिए।

वैसे  इन सब के बावजूद फिनलैंड और इराक़ के बीच अंतर  पर ध्यान देना भी बेहद ज़रूरी है।

इराक़ भी फिनलैड की ही तरह अपने से अधिक शक्तिशाली पड़ोसी रखता है लेकिन इराक़ के हालात, फिनलैंड से अधिक जटिल और कठिन हैं। इराक़ को अपने शक्तिशाली पड़ोसी ईरान के साथ ही साथ, तुर्की और सऊदी अरब पर भी ध्यान देना होगा और फिर वह एक बेहद कमज़ोर सरकार सीरिया का भी पड़ोसी है। इराक़ की सरकार, 40 के दशक में फिनलैंड की तुलना में आज भी विकासशील है।

ईरान इराक़ में स्वंय सेवी बल का जिसे हश्दुश्शाबी कहा जाता है, समर्थन करता है जबकि अमरीका भी इराक़ में खुद उपस्थित है। सोलहवीं सदी में जब ओटोमन शासकों ने ईरानी साम्राज्य को बगदाद से बाहर निकाला तब से ईरान को इराक़ मे विशेष दिलचस्पी है। ईरान के अंतिम नरेश ने हमेशा कुर्दों की महत्वकांक्षाओं का समर्थन किया और शिया धर्मगुरुओं के संपर्क में रहे ताकि इस तरह से वह क्षेत्र में अपने एक शक्तिशाली प्रतिस्पर्धी को रोक सके। सद्दाम के पतन के बाद एक बार फिर ईरान ने अपने पड़ोस में बड़े खतरे को सिर उभारने से रोक दिया।

इन हालात में अगर इराक़ को फिनलैंड बनाना है तो कुछ वचनों की ज़रूरत होगी।

सब से पहले तो यह ज़रूरी है कि अमरीका और ईरान, इराक़ की अखंडता के प्रति कटिबद्ध रहें। यह ज़िम्मेदारी इराक़ी सरकार की है कि वह अपने किसी प्रांत को स्वाधीनता दे या न दे, अमरीका और ईरान को इस तरह के मामलों में नहीं पड़ना होगा जैसा कि  इराक़ के कुर्दिस्तान के मामले में हुआ था। इस तरह से तुर्की को भी इत्मीनान होगा जो बरसों से अलगाववादी कुर्दों से जूझ रहा है। तुर्की को यह चिंता है कि इराक़ में एक कुर्द स्वाधीन राज्य, तुर्की के कुर्दों में भी अलगाववाद की भावना को भड़का सकता है, हालांकि  यही  चिंता ईरान को भी है।

दूसरी बात यह है कि जैसा कि आस्ट्रिया के समझौते में हुआ था, अमरीका और ईरान को इस बात पर सहमत होना चाहिए कि वह औपचारिक व अनौपचारिक रूप से इराक में मौजूद अपने सभी बलों को बाहर निकाल लेंगे। इराक़ में  विदेशियों की सभी छावनियां, बगदाद सरकार के हवाले कर दी जांए या फिर उन्हें तबाह कर दिया जाए।

तीसरी बात यह है कि अमरीका और ईरान को आतंकवाद के खिलाफ  युद्ध में केवल बगदाद सरकार की मदद करना चाहिए । इसके साथ ही ईरान और अमरीका अपने नौसेना के रास्ते अलग करके , थल सेना के रास्ते निर्धारित करके और इसी तरह फार्स की खाड़ी में अपातकालीन संपर्क व्यवस्था विकसित करके किसी भी  अनहोनी को टाल सकते हैं।

ईरान पर अधितम दबाव की ट्रम्प की नीति युद्ध भड़का सकती है लेकिन दोनों देश इराक़ को फिनलैंड बना कर और एक दूसरे के हितों का सम्मान करके इस प्रकार के खतरे को खत्म कर सकते हैं। (साभार; pars today)

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