अमरीका ने छोड़ा सऊदी अरब का साथ, सुधर सकते हैं सऊदी-ईरान के रिश्ते?

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सऊदी अरब से निकट समझे जाने वाले लंदन से प्रकाशित समाचार पत्र अल अरब ने अमरीका, सऊदी अरब और ईरान की भूमिका और संबंधों पर एक रोचक लेख प्रकाशित किया है।

मध्य पूर्व मामलों के विशेषज्ञ जेम्स डोर्सी का मानना है कि सऊदी अरब से पेट्रियॉट मिसाइलों को हटाने और अपने सैनिकों को वापस बुलाने के अमरीकी फैसले के बाद अब सऊदी अरब को यह यक़ीन हो गया है कि वह अपनी सुरक्षा के लिए पूरी तरह से अमरीका पर भरोसा नहीं कर सकता।

     सऊदी अरब से निकट समझे वाले अंतरराष्ट्रीय समाचार पत्र अलअरब ने लिखा है कि अधिकांश विशेषज्ञों का यह मानना है कि सऊदी अरब से अमरीका की वापसी, इस देश के अधिकारियों के लिए ईरान के साथ शक्ति संतुलन बनाने का एक सुनहरा अवसर है। सऊदी अरब अपने घटकों की संख्या बढ़ा सकता है जैसा कि उसने फ्रांस, रूस और दक्षिणी कोरिया से संबंध बना कर किया था।  

     सऊदी अरब की समझ में आ गया है कि अमरीका पर भरोसा अस्थाई है और अपनी सुरक्षा के लिए खुद कुछ करना होगा। यही वजह है कि रियाज़ की यह कोशिश है कि वह परमाणु क्षेत्र में आगे बढ़े और इसी तरह अंतरिक्ष और बैलिस्टिक मिसाइल के क्षेत्र में ईरान के बराबर पहुंचने की कोशिश करे।,

विशेषज्ञों का यह भी मानना है कि अगर सऊदी अरब अत्याधुनिक हथियारों की तकनीक प्राप्त करेगा तो इससे फार्स की खाड़ी और मध्य पूर्व में हथियारों की दौड़ शुरु हो जाएगी और यह स्थिति ईरान के हित में होगी। क्योंकि अब तक पश्चिमी देश, सऊदी अरब के साथ संतुलन की वजह से ईरान पर सैन्य शक्ति  न बढ़ाने के लिए दबाव डालते रहे हैं और उसका रास्ता रोकते रहे हैं लेकिन जब सऊदी अरब भी इस राह पर चल निकलेगा तो फिर ईरान के सामने बाधा खड़ी करने का कोई अर्थ नहीं होगा।

     ध्यान योग्य संयोग यह भी है कि जब अमरीका, सऊदी अरब से अपने सैनिकों की संख्या में कमी कर रहा था और पेट्रियॉट मिसाइल निकाल रहा था  उसी दौरान ईरान ने अपना पहला सैन्य उपग्रह अंतरिक्ष में सफलता से स्थापित कर दिया और इस तरह से दुनिया के उन 12 देशों में शामिल हो गया जो इस प्रकार की सेटेलाइट अंतरिक्ष में भेज सकते हैं लेकिन अस्ल बात यह है कि अमरीका के प्रतिबंधों और कोरोना के बावजूद किसी ही प्रकार की हथियारों की होड़ में ईरान की शक्ति असाधारण और उसमें वृद्धि भी हो रही है।

     अमरीका और इस्राईल में ईरान के विरोधियों ने ईरान की सैनिक सेटेलाइट पर चिंता प्रकट की है और उन्हें यह आशंका है कि इस सफलता की वजह से कहीं ईरान की बैलिस्टिक मिसाइल क्षमता भी न बढ़ जाये जिससे ईरान के हिज़्बुलाह जैसे मित्र संगठनों को भी शक्ति बढ़ सकती है।

     इस हालात में सऊदी अब को अब यह समझ लेना चाहिए कि उसकी सुरक्षा, लंबे लंबे समझौतों पर नहीं बल्कि अमरीकी नेताओं के मूड पर निर्भर है।

इसी दौरान यह चिंताजनक खबर भी है कि ईरान धीरे धीरे परमाणु समझौते से निकल रहा है जिसका मतलब यह होगा कि वह अपने परमाणु कार्यक्रमों को सीमित करने वाले नियमों से भी आज़ाद हो जाएगा जिसके बाद परमाणु बम बनाने का समय भी काफी  कम हो जाएगा।  

     उधर पता चला है कि सऊदी अरब में परमाणु बिजलीघर बनाने के लिए अमरीका से चलने वाली वार्ता रुक गयी है। सऊदी अरब, ईरान के साथ हथियारों की दौड़ को केवल संतुलन के साधन के रूप में नहीं देखते बल्कि सऊदी अधिकारियों की कोशिश है कि इस तरह वह मध्य पूर्व में सुरक्षा, अर्थ व्यवस्था और कूटनीति  के क्षेत्र में ईरान की तरह ही मज़बूत भूमिका निभा सके।

     ईरान ने अपना पहला मिलिट्री सेटेलाइट अंतरिक्ष में भेज कर सऊदी अरब के लिए एक और चुनौती पैदा कर दी है और स्वंय सऊदी अरब को छोड़ कर आगे चला गया है। ईरान के बैलेस्टिक मिसाइल और देश में निर्मित युद्ध विमान, ईरान के साथ चल रही प्रतिस्पर्धा में सऊदी अरब के लिए अलग चुनौतियां हैं।

          पिछले साल सेटेलाइट के चित्रों से पता चलता है कि सऊदी अरब ने रेगिस्तान में एक छावनी बनायी है जिसे वास्तव में परमाणु परीक्षण के लिए डिज़ाइन किया गया और हो सकता है कि सऊदी अरब वहां बैलेस्टिक मिसाइल भी बनाना शुरु कर दे। बहुत से विशेषज्ञों का मानना है कि सऊदी अरब ने रेगिस्तान में यह छावनी बनायी ही है इस लिए ताकि ईरान से मुकाबले की शक्ति प्राप्त कर सके।

     उदाहरण स्वरूप में कार्यक्रमानुसार सऊदी अरब अगले साल युद्धक विमान बनाने का इरादा रखता है जो ईरान में बने युद्धक विमानों की तरह होता है।

      अलअरब समाचार पत्र के अलावा भी अब यह खबर आ रही है कि सऊदी अरब के क्राउन प्रिंस बिन सलमान ने इराक़ के नये प्रधानमंत्री अलकाज़ेमी को बधाई के लिए टेलीफोन के दौरान उनसे कहा है कि वह सऊदी अरब और ईरान के बीच मध्यस्थता करें। अमरीका के निराशा के बाद अब अनुमान लगाया जा रहा है कि सऊदी अरब ईरान की ओर बढ़ सकता है वैसे यह भी हो सकता है कि सऊदी अरब, अमरीका को धमकी देने के लिए भी ईरान की तरफ क़दम बढ़ा सकता है ताकि इस तरह से वह अमरीका को यह संदेश दे सके कि अगर वह सऊदी अरब से अधिक दूर हुआ तो रियाज़ तेहरान से निकट हो जाएगा।  

सऊदी अरब और अमरीका के बीच जो कुछ हो रहा है उससे यह सच्चाई एक बार फिर साबित हो गयी है कि अमरीका पर भरोसा करने वाला हमेशा धोखा ही खाता है। (साभार: pars today)

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