Thursday, April 25, 2024
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विलादत ए जनाबे फा़तिमा ज़हरा (स.अ.) पर एक ख़ास पेशकश

 

इस्मे आज़म की तरह तासीर या ज़हरा की है।

 विलादत ए जनाबे फा़तिमा ज़हरा (स) पर विशेष…… 

 सोच रहा हूं कहां से लिखना शुरू करू,20 जमादियुस्सानी को शहजादी ए कौनैन रसूले खुदा (स) के घर में क़ुरान बनकर उतरी।

जैसे जैसे हज़रत फ़ातेमा (स) बड़ी होती गई उन के औसाफ़ व कमालात नुमायां होते चले गये, दुनिया ने हुस्न व हया और पाकीज़गी के पैकर को ख़ान ए रसूल (स) में बनते और सँवरते देखा।

तारीख़ें इंसानियत में अगर हम किसी औरत की तारीख़ को पढ़ने बैठे तो हज़रत मोहम्मद मुस्तफा़ (स) इकलौती बेटी जनाबे फा़तिमा ज़हरा की ज़ात तमाम तर औरतो मे बलन्द और बाला नज़र आती है आपके ज़ात वो वाहिद मीज़ाने इलाहिया है कि जिसके एक पलड़े में मशीयत ने नबूवत को और दूसरे पलड़े में विलायत को रखा है !फ़ातेमा ज़हरा (अ) वह ख़ातून है जिन के लिये ख़ुद रसूले ख़ुदा, ख़ातमुल अंबिया, अहमद मुजतबा हज़रत मुहम्मद मुस्तफ़ा का फ़रमान है: फ़ातेमतो बज़अतुम मिन्नी, फ़ातेमा मेरे जिगर का टुकड़ा है।

जिसकी पर पूरी ज़िन्दगी में एक लम्हा भी इबादत ए ख़ुदा साकित ना हो उसे शरीयत ए मोहम्मदी में जनाबे फा़तिमा ज़हरा कहते हैं

 

जनाबे काशिफ़ अयोध्यावी कि मुझे वो मिसरे ज़हरा सलामुल्लाह अलैहा पर लिखते वक्त़ अक्सर याद आ जाते हैं कि… 

 

*उस जगह तुम ढूंढने निकले हुए ज़हरा (स) का जवाब  ?* 

*जिस जगह फिज़्ज़ा (स) की जूती का कोई सानी ना हो  !*

और ऐसा हो भी क्यों ना जिसका बाप और शौहर उम्मत के बाप कहलाये,जिसके बच्चे जवानाने जन्नत के सरदार कहलाएं,जिसकी मां मलिकातुल अरब कहलाए,मौत का फरिश्ता जिसकी इजाज़त के बिना घर में दाखि़ला ना हो सकता हो,सितारे जिसके दरवाजे़ पर उतरते हों, जिब्राईल और मिकाईल जिसके नौकरों में शामिल हों,जिसके बच्चों के कपड़े जन्नत से आते हो, जिसके बच्चों का नाका वक्त़ का रसूल (स) हो,जिसके बच्चे आग़ोशे मादर में वही ए इलाही की आवाज़ सुनते हो,मैं यह सोचने पर मजबूर हूँ कि जैसी ख़ैरात फ़ातेमा ज़हरा (स) ने की वह यक़ीनन बशरी ताक़त से बाहर है सैकड़ों क़ुरानी आयात जिसकी शान में नाजिल हुई हो,जो मुबहिला मे नबूवत पर सच्ची गवाह हो,जो मिस्दाक ए सूर ए कौसर सूर ए दहर  हो,जो अहलेबैत ए नबूवत और रिसालत हो और रसूले ख़ुदा  (स) जिसे देखकर अहेतराम में खड़े हो जाते हो,जिसके बच्चे ज़बान ए रिसालत चूस के बड़े हुए हो,जिसे नबी (स )उम्मे अबीहा कहते हो, जो मर्जी़या हो,मारिया हो,सिद्दीक़ा हो,मुहद्देसा हो,ताहेरा हो,जनाबे फ़ातिमा की जितनी शान बयान की जाय कम है…!

एक रिवायत के मुताबिक शहज़ादी फ़ातिमा ज़हरा जब क़यामत के दिन मैदाने महशर में आएंगी, तो एक आवाज़ आएगी ऐ अहले महशर अपनी नज़रें झुका लो मेरी कनीज़े ख़ास की सवारी आ रही है।

इब्ने अब्बास से रिवायत है

 

सूरए शूरा की यह आयत नाज़िल हुई तो इब्ने अब्बास ने अर्ज़ किया, या रसूलल्लाह आपके वह रिश्तेदार कौन है जिनकी मुहब्बत हम लोगों पर वाजिब है? तो हज़रत (स) ने फ़रमाया: अली, फ़ातेमा और उनके दोनो बेटे।

(मुसनदे अहमद जिल्द 1 पेज 199

एक और रिवायत के मुताबिक पैग़म्बर स.अ. हर दिन सुबह की नमाज़ के लिए उठने के बाद जब मस्जिद की तरफ़ तशरीफ़ ले जाते तो रास्ते में हज़रत ज़हरा स.अ. के मुबारक और आसमानी घर के पास रुकते और ऊंची आवाज़ में फ़रमाते:

सलाम हो आप पर ऐ अहलेबैत और फिर आयते ततहीर की तिलावत करते  थे

जनाबे फातिमा की ज़ात को कम करने के लिए यु तो लोगों ने नबी ए करीम की चार बेटियां बताई मगर जनाबे फा़तिमा की ज़ात  अपने आप में एक मुकम्मल दलील बनकर ऐसे किसी भी फ़िक्र और नज़रिए को रदद करती है बाकौल  शायरे अहलेबैत…. 

नबी की बेटीयाँ गर चार है तो बिस्मिल्लाह 

ख़ुदा के दीं का मुक़द्दर फक़त बैतूल ही क्यों  ? 

निसा के देस में बरतर फक़त बैतूल ही क्यों   ? 

वो जिसका जि़क्र है घर-घर फक़त बतूल ही क्यों 

हिजाबे ख़ालीके अकबर फक़त बतूल ही क्यों  ? 

लड़े बगैर भी हैदर फक़त बतूल ही क्यों 

है जिसके अर्श पे नौकर फक़त बतूल ही क्यों 

मलक है जिसके गदागर फ़क़त बतूल ही क्यों ? 

इमाम बच्चों की मादर फ़क़त बतूल ही क्यों 

मोबाहिला में है दुख़्तर फ़क़त बतूल ही क्यों  ? 

खुद अपने बाप की मादर फ़क़त बैतूल ही क्यों ? 

इलाज ए ज़ोफ़े पयम्बर फ़क़त बैतूल ही क्यों ?

 वजूद ए सूर ए कौसर फ़क़त बतूल ही क्यों  ?

हज़रत ज़हरा (स) की सबसे बड़ी एक सीख यह भी है कि बातिल कितना ही तकद्दुस का लिबास पहन कर आए और कितना ही ताकतवर क्यों ना हो हक़ की हिमायत में ज़ुल्म के खिलाफ़ सीसा पिलाई हुई दीवार की तरह डट जाओ।

ना तो किसी धर्म के और ना ही किसी दुनिया के इतिहास में यह मिलता है कि ज़हरा (स) से पहले किसी जवान ख़ातून ने वक्त़ के कद्दावर नेता के दरबार में जाकर अपना हक़ मांगा हो। 

यह बात क़यामत  तक आने वाली महिलाओं को बेख़ौफ़ एवं निडर होने का दर्स देती रहेगी 

जनाबे फ़ातिमा ज़हरा सलामुल्लाह अलैहा कि ज़ात वाहीद ज़ात है जिस ज़मीन पर अल्लाह ने अपना वसीला क़रार दिया  ! 

सूरा सूरा और आयत बाख़ुदा ज़हरा (स) की है 

हलअता ज़हरा का है और इन्नमा ज़हरा (स) की है 

दूर करता हर परेशानी को है ज़हरा (स) का नाम 

इस्में आज़म की तरह तासीर या ज़हरा (स) की है

और आखिर में दुआ करता हूं कि परवरदिगार हमारे वालदैन का साया हमारे वजूद को इसी तरह रोशन करता रहे जिस तरह तेरा वजूद सारी कायनात को रोशन करता है और हमें आख़री दम तक इमाम अली और उनकी पाक़ीज़ा औलाद की मोहब्बत पर का़यम रख  !! 

आमीन या रब्बुल आलमीन

 

आज़म ज़ैदी…. ✍

 

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