Thursday, April 25, 2024
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मै फिरका ढूंढने में नाकाम रहा

 

 

स्पेशल रिपोर्ट: पत्रकार शहजाद आब्दी- यहाँ क्लिक कर हमारा फेसबुक पेज लाइक करें  -आज के इस माहोल में अगर आप नजर करे तो आपको मुस्लिम उम्मत में बहुत सारे फिरके मिलेंगे. कोई अपने आपको सुन्नी कहता है, कोई शिया, हनफ़ी, हम्बली, मालिकी, शाफई, देवबंदी, बरेलवी, कादरियाह, चिश्तियाह, अहमदिया, जाफरियाह, वगैरह वगैरह. हर एक फिरका एक दूसरे से मुहं मोड़कर अपना अपना मजहब बना लिया है. जबके उनके मजहब के कानून और आमाल देखे तो वह एक दूसरे से बिलकुल अलग है फिर भी अपने आपको मुसलमान कहते है. हर एक ने अपने अपने इमाम, किताबें, मस्जिदे, मदरसे, और मुसल्ली (नमाजी) बाँट लिए है और यहाँ तक कि अपनी पहचान के लिए पहनावे में कुछ ना कुछ खास बातें रख ली है जिसकी बुनियाद पर वह फिरका लोगो से अलग पहचान लिया जाए. बड़े हैरत कि बात यह है कि हर एक फिरका अपने आपको सिराते मुस्तकीम (सीधे रास्ते) पर जानता है और कहता है. उनके पास जो इस्लामी सोच है उससे वह खुश है. इस बात को अल्लाह तअाला ने कुरआन में कुछ इस तरह बयान किया है, 

 “जिन्हों ने अपने दीन के टुकडे टुकडे कर दिए और गिरोह (फिरको) में बंट गए, हर गिरोह (फिरका) उसी से खुश है जो उसके पास है” (सुरह: रूम:३२) 

हर फिरका दूसरे को गुमराह मानता है और अपने आपको सीधी राह पर जानता है. ये ही बात यहूद और नसारा में भी थी जिसे अल्लाह तअाला ने कुरआन में बताया है, 

                  “यहूद ने कहा ‘नसारा किसी बुनियाद पर नहीं’ और नसारा ने कहा ‘यहूद किसी बुनियाद पर नहीं’ हालाकि वे दोनों अल्लाह तअाला कि किताब पढते है” (सुरह बकरह:११३)

एक शख्स ने बड़ी कोशिश की के क़ुरआन पढ़ कर ख़ुद को सुन्नी साबित करे मगर नाकाम रहा। वह शख्स कहता है कि मैंने तमाम क़ुरानी सूरतें पढ़ीं मगर मुझे न कोई शिया मिला, न बरेलवी, न देवबंदी, और न ही अहले -ए-हदीस।

 

बल्कि जो मिला यहाँ पढ़िए …

(1) अल्लाह ने पहले भी तुम्हारा नाम मुस्लिम रखा था और इस (क़ुरआन) में भी (तुम्हारा यही नाम है) ताकि रसूल (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) तुम पर गवाह हों…।

(सुर: हज 22/78)

(2)  वो कहता है मैंने कोशिश की, के मुहम्मद ﷺ की सीरत (जीवनी) को पढ़कर अपने आपको किसी फ़िरके से जोडूं, मगर यहाँ भी मुझे नाकामी हुई।

(3) उसको हर जगह सिवाय एक मुसलमान (मुस्लिम) के अपनी दूसरी पहचान न मिली। अगर फ़िरके का कहीं ज़िक्र आया भी तो रद करने के अंदाज़ में,एक गुनाह, एक तम्बीह की हैसियत से।

(4) सब मिल कर अल्लाह की रस्सी को मज़बूती से थाम लो और फिर्क़ों में मत बटो…।”

(सुर: आले इमरान 3/103)

(5) “तुम उन लोगो की तरह न हो जाना जो फिरकों में बंट गए और खुली-खुली वाज़ेह हिदायात पाने के बाद इख़्तेलाफ़ में पड़ गए, इन्ही लोगों के लिए बड़ा अज़ाब है”

(सुर:आले इमरान 3/105)

(6) “जिन लोगों ने अपने दीन को टुकड़े टुकड़े कर लिया और गिरोह-गिरोह बन गए, आपका (यानि नबी सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम का) इनसे कोई ताल्लुक नहीं, इनका मामला अल्लाह के हवाले है, वही इन्हें बताएगा की इन्होंने क्या कुछ किया है…।”

(सुर: अनआम 6/159)

ये सब बाते पढने के बाद वह व्यक्ति कहता है  इन सब वाज़ेअ अहकामात के बावजूद आज हम एक मुसलमान के अलावा सब कुछ हैं, हम फ़िरक़ों में इतने बुरी तरह से फंस गए हैं के हमारी शनाख़्त ही गुम हो गयी

(7) “फिर इन्होंने खुद ही अपने दीन के टुकड़े-टुकड़े कर लिए, हर गिरोह जो कुछ इसके पास है इसी में मगन है…।”

(सुर: मोमिनून 23/53) हम हमारे आपसी इख़्तेलाफ़ को अल्लाह के हवाले क्यूँ नहीं करते ।क्यों खुद ही फैसला करने बैठ जाते हैं ..

(8) “तुम्हारे दरमियान जिस मामले में भी इख़्तेलाफ़ हो उसका फैसला करना अल्लाह का काम है…”

(सुर: शूरा 42/10)

 

✨बल्कि हमें तो ये हुक्म दिया गया है कि-

(9)”बेशक सारे मुसलमान भाई भाई हैं, अपने भाइयों में सुलह व मिलाप करा दिया करो और अल्लाह से डरते रहो ताकि तुम पर रहम किया जाये…।”

(सुर: हुजरात 49/10)

जब उस व्यक्ति को कुरान और हदीस में कही भी ऐसी बात ना मिली के वो अपने फिरके हो सही और दुसरो को गलत बता सके तो उस व्यक्ति ने कहा कि “”मै फिरका ढूंढने में नाकाम रहा“”

 

•फिरकाबंदी कि वजह?

मुस्लिम उम्मत में जो फिरकाबंदी पैदा हुई उसकी तहकीक अगर कि जाए तो यह बुनियादी वजह मिलती है कि हमने अल्लाहताला के कुरआन को और रसूल (स.अ.व.) के फरमान को छोड दिया है.  हुजुर ने अपने आखरी हज से वापसी के समय गदीर नामक जगह पर सवा लाख हाजियों के सामने अल्लाह के हुकुम से एक भाषण दिया और कहा की जिस-जिस का मै मौला हूँ उस -उस के ये अली मौला है मेरे बाद मेरे उत्तराधिकारी अली है कहा ऐ मुसल्माओ मेरे बाद मेरी दो चीजों को मजबूती से पकडे रहना मै आपलोगों के बीच अपनी दो चीज़े छोड़ कर जा रहा हूँ अपने अहलेबैत और कुरान को छोड़ कर जा रहा हूँ अगर तुमने इनदोनो में से किसी को भी छोड़ दिया तो भटक जाओगे हालाक हो जाओगे मगर आजके हालत देखकर लगता है कि मुलसमानो ने  इन दोनों चीजों को छोडकर अपने अपने मुफ़्ती, मौलवी, हाफिजो कि बातों को अपना लिया है और उनके  हुक्मो को उस हद तक का दर्जा दिया है कि उनकी तमाम बातो को सच समझ लिया है. आम मुसलमान ने कभी यह कोशिश नहीं की के इन बातो को कुरआन और हदीस के मुकाबले में रखे या उसकी तहकीक करे. और अगर किसी ने कुछ छान-बीन करने की कोशिश की भी तो धर्म के ठेकेदारों ने लोगो को इतना डरा दिया की अगर इस्लाम के बारे में कही उल्हज गये तो इमांन ख़तरे में पड़ जायेगा, अगर दूसरे अल्फाज में कहा जाए तो हमने अपने आलिमो को ‘रब’ बना लिया है. अल्लाह तअाला कुरआन में फरमाते है:-

      “उन्होंने अपने आलिमो और दरवेशों को ‘रब’ बना लिया है.(सुर: तौबा:३१) 

                        अरब के आलिम इमाम अबू हनीफा (र.अ.), इमाम शाफई (र.अ.), इमाम मालिक (र.अ.) और इमाम इब्ने हम्बल (र.अ.) जिनकी ओर हम अपनी निस्बत करते है उन्होंने क्या इस्लाम को छोडकर अपना अलग मजहब बनाया था या बनाने का हुक्म दिया था? हरगिज नहीं बल्कि सभी का ये ही कौल था कि अगर हमारी बात कुरआन या हदीस कि बात से टकराये तो हमारी बातो को छोडकर कुरआन या हदीस कि बातों को सीने से लगा लेना. फिर हम उम्मत को क्या हुआ है कि हमें कुरआन कि आयत या सहीह हदीस मिलने के बावजूद सिर्फ अपनी जिद कि वजह से उन जाहिल मुफ्तियों, मौलवियों और हाफिजो कि बातों को अपनाये हुए है? जो कभी उम्मत ऐ मुस्लिम को एक नहीं होने देना चाहते और अपने ज़ाती फायदे के लिए उम्मत को आपस में लडवा रहे हैं.

 

फिरकाबंदी के नुक्सानात!

फिरकाबंदी का सबसे बड़ा नुक्सान यह है कि हम अल्लाह तअाला और उसके रसूल(स.अ.व.) से दूर हो जायेंगे. इस बात को कुरआन में कुछ इस तरह बयान किया है:-

                “जिन लोगो ने अपने दीन के टुकडे टुकडे कर दिए और गिरोह (फिरकों) में बंट गए, (अय नबी) तुमको उनसे कुछ काम नहीं. उनका मामला बस अल्लाह के हवाले है. वही उन्हें बतलायेगा कि वे क्या कुछ करते थे.” (सुर: अल अन्आाम:१५९)

 तो कुरआन कि इस आयत से मालूम हुआ कि अगर हम फिरके बनायेंगे तो अल्लाह तअाला और उसके रसूल(स.अ.व.) से दूर होकर गुमराह हो जायेंगे और गुमराही का मतलब है हमेशा के लिए जहन्नम, फिरकाबंदी कि वजह से हमारे अंदर हक(सच) को तलाश करने का जज्बा(तमन्ना) खत्म हो जाता है और हम अपने मुफ़्ती या हाफिज़ की बातो को बिना कुरआन और हदीस कि दलाइल के हक(सच) मानने लगते है. फिर ना हम कुरआन समझने के लिए तैयार होते है और ना ही हदीस समझकर उस पर अमल करेने के लिए!

              लोग फिरकाबंदी के घरों में अपने आप को बन्द करके अपने मुफ़्ती या हाफिज़ के कौल कि कुंडी लगा लेते है, फिर चाहे आप बाहर से उन्हें कितनी भी कुरआन कि आयत सुनाये या फरमाने रसूल(स.अ.व.) सुनाओ मगर वह उसको मानने के लिए तैयार नहीं होता और अपने बडो के कौल कि कुंडी खोलकर फिरकाबंदी के घर से बाहर निकलना ही नहीं चाहता!

फिरकाबंदी की वजह से हम मुसलमान लोग आपस में एक दूसरे से नफ़रत करने लगते है और फिर शैतान अपनी चल चलकर हमें आपस में लड़ाता है. हालाकि हम मुसलमान एक उम्मत है और अल्लाह तअाला ने हमें एक दीन “इस्लाम” दिया है जो बिलकुल सीधा सादा दीन है जिसे कुरआन में कुछ इस तरह बयान किया है:-

“तुम इब्राहीम के दीन को अपनाओ जो हर एक से अलग होकर एक (अल्लाह तअाला) के हो गए थे और मुशरिको में से ना थे” (सुरह आले इमरान:९५)

 

अल्लाह तअाला फरमाते है:-

“इब्राहीम न यहूदी थे न नसरानी बल्के सीधे सादे मुसलमान थे और मुशरिक भी न थे.”(सुरह आले इमरान:६७) 

 

अल्लाह तअाला फरमाते है:-

                  “सब मिलकर अल्लाह कि रस्सी को मजबूती से पकडो और आपस मे फूंट पैदा न करो” (सुर: आले इमरान:१०३)

अल्लाह तअाला के रसूल(स.अ.व.) ने भी हमें एक रहने को कहा है और उनकी बुनियादी बात भी बतलाते हुए फरमाया है:-

        “मै तुम्हारे दरमियान दो चीजे छोड़े जा रहा हूँ अगर तुम उन पर अमल करोगे तो कभी गुमराह नहीं होंगे, वह दो चीजे है अल्लाह कि किताब (कुरआन) और मेरी अहलेबैत!

(मोत्ता मालिक:२२५१, रिवायात अबू हुरैरह(रदी.)

 

अल्लाह तअाला ने हमें सिर्फ दो हुक्म मानने के लिए कहा है, जिसे कुरआन में बताया है कि:-

          “अल्लाह कि इताअत करो और उसके रसूल (स.अ.व.) कि इताअत करो ताकि तुमपर रहम किया जाए.”(सुर: आले इमरान:१३२) कुरआन कि यह आयत हमारे बिच के गिरोहबंदी के हल का तरीका ब्यान करती है.

 

•फिरकाबपरस्ती का अंजाम!

अल्लाह तअाला के कुरआन कि यह आयतें और रसूल(स.अ.व.) के फरमान के बावजूद अगर हम फिरकापरस्ती पर कायम रहे तो अल्लाह कुरआन में लोगो को आगाह करते हुए फरमाते है:-

                 “उस वक़्त को याद करो जब कि वे लोगो (पीर/इमाम/आलिमो) के पीछे चले थे अपने मुरीदो से अलग हो जायेंगे और अजाब उनके सामने होगा और उनके आपस के सारे नाते टूट जायेंगे. (सुर: अल बकरह:१६६)

याद रखो ! क़्यामत के दिन कोई किसी के काम न आएगा. सिर्फ जिद, वहम् और माहौल कि वजह से हक बात का इन्कार ना करो और तुम खूब जानते हो कि हक बात सिर्फ कुरान और हदीस है!

आज यह माहोल है कि अगर मैं कोई फिरके में सिर्फ इसलिए हूँ कि मैंने अपने बाप-दादा को ये ही करते और कहते देखा है तो जान लो अल्लाह तअाला कुरआन में फरमाते है:-

        “जब उनसे कहा जाता है कि अल्लाह ने जो कुछ उतारा  है उसके मुताबिक चलो, तो कहतें है, नहीं! हम तो उसी के मुताबिक चलेंगे जिस पर हमने बाप-दादा को पाया, क्या इस हाल में भी के उनके बाप-दादा ना-समझ और ना सही रास्ता जानते हो! (सुर: अल बकरह:१७०)

 

अल्लाह तअाला फरमाते है:-

             “जब उनसे कहा जाता है कि उस चीज कि तरफ आओ जो अल्लाह ने उतारी है (कुरआन) और रसूल (स.अ.व.) कि ओर  तो वह कहते है ‘हमारे लिए वो ही काफी है जिस पर हमने अपने बाप दादा को पाया है. क्या यदि उनके बाप दादा कुछ भी ना जानते हो और ना सही रास्ते पर हो तब भी!” (सुर: अल माइदा:१०४)

 

मेरी कोशिश:-

उम्मत के हर फिरके को हमारी दावत है कि हम अपने बनाये हुए मजहब को छोडकर अल्लाह के उस दीन कि ओर लौट आए जिस दीन के अहकाम और नियम मुकम्मल है. जिसे कुरआन और हदीस कि शक्ल में महफूज किया गया है और हर फिरका उसे हक जानता है. इसलिए हम अपने आमाल सिर्फ और सिर्फ कुरआन और सुन्नत के मुताबिक बनाये. हर एक फिरका अपना अपना लेबल छोडकर अपने आपको सिर्फ “मुसलमान” कहे और हर एक फिरका अपना अपना बनाया हुआ मजहब छोडकर अल्लाह का दीन जो कि इस्लाम है उसे अपनाए.

            दिन में पांच बार हम अल्लाह से हर नमाज में दुआ करते है कि “हमें सीधे रास्ते पर रख” (सुरह फातिहा:५) तो जब अल्लाह ने सीधा रास्ता दिखाया है उससे हटकर हम क्यों फिरकाबंदी करके अपने आपको गुमराह कर रहे है और सीधे रास्ते से दूर हो रहे है?

 

अल्लाह कुरआन में फरमाते है:-

           “उस चीज (कुरआन) को मजबूती से पकडे रहो जो तुम्हारी ओर वही कि जाती है, बेशक तुम सीधे रास्ते पर हो.” (सुर: अज जुखरुफ़:४३)

 

इन सब आयतों की रौशनी में मै आप सब से निवेदन करना चाहूँगा कि-

•°छोड़ दीजिए वो तमाम बाते और अमल जो अल्लाह के कुरआन और रसूल(स.अ.व.) के फरमान के खिलाफ हो|

•°छोड़ दीजिए अपने-अपने मुफ़्ती और मौलवियों कि किताबें और पकड़ लीजिए अल्लाह की किताब (कुरआन) हम इसी बुनियाद पर एक उम्मात बन सकते है और हमारे बिच मुहब्बत कायम हो सकती है!

हम अल्लाह तआला से दुआ करते है कि हमें इस उम्मत के बीच से फिरकापरस्ती खत्म करने कि समझ दे और दीन ए ‘इस्लाम’ पर हमें कायम रखे..

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