Thursday, April 25, 2024
No menu items!
Homeइंसानियत के रखवालेइमाम अली अ.स. की ज़िंदगी

इमाम अली अ.स. की ज़िंदगी

रिपोर्ट अली अब्बास नकवी 


 

  • अलवी ज़िंदगी

इमाम अली अ.स. की ज़िंदगी बिल्कुल क़ुर्आनी और इस्लामी ज़िंदगी थी जिसको जानना और जिसके हिसाब से जिंदगी गुज़ारना हम सभी पैरवी करने वालों के लिए ज़रूरी है, क्योंकि आपकी तरबियत पैग़म्बर स.अ. और क़ुर्आन के साए में हुई थी। इमाम अली अ.स. कौन थे? क़ुर्आन की आयतों की रौशनी में आप नफ़्से पैग़म्बर स.अ. हैं (सूरए आले इमरान, आयत 61) 

 

आप उन ऊलुल अम्र लोगों में से एक हैं जिनकी इताअत क़ुर्आन ने वाजिब बताई है (सूरए निसा, आयत 59) आपको क़ुर्आन ने आलिम और पूरे क़ुर्आन का इल्म रखने वाला कहा है (सूरए रअद, आयत 43 और कुछ तफ़सीरी रिवायतें) 

आप क़ुर्आन की रौशनी में मासूम हैं (सूरए अहज़ाब, आयत 33, और कुछ तफ़सीरी रिवायतें) इसके अलावा और भी बहुत सी आयतें और तफ़सीरी हदीसें हैं जिनमें आपके फ़ज़ाएल बयान किए गए हैं। 

इमाम अली अ.स. की इस से बढ़ कर और क्या फ़ज़ीलत हो सकती है कि पैग़म्बर अ.स. अहम राज़ आपसे बताते थे और किसी के बारे में ऐसी कोई भी रिवायत नहीं मिलती कि जिससे पैग़म्बर स.अ. ने दीनी राज़ कहे हों, जैसाकि अहले सुन्नत के बड़े आलिम लिखते हैं कि पैग़म्बर स.अ. इमाम अली अ.स. से अहम राज़ों का बताया करते थे और इस बारे में ख़ुद इमाम अली अ.स. ने फ़रमाया कि जितना मैं पैग़म्बर स.अ. से क़रीब था उतना कोई भी दूसरा नहीं था। (मुसनदे अहमद, जिल्द 1, पेज 77—5) 

संक्षेप में ही सही लेकिन इन फ़ज़ीलतों से यह बात तो तय हो गई इमाम अली अ.स. की शख़्सियत की क्यों पैरवी ज़रूरी है, क्योंकि क़ुर्आन ही के मुताबिक़ जिसके पास पूरे क़ुर्आन का इल्म है और वह मासूम भी है और उस की इताअत वाजिब भी है और पैग़म्बर स.अ. से उस से ज़्यादा कोई दूसरा क़रीब भी नहीं था तो अब ज़ाहिर है उसकी ज़िंदगी आइडियल ही होगी क्योंकि ज़िंदगी क़ुर्आन की आयतों और पैग़म्बर स.अ. की हदीसों की तफ़सीर है। 

इस लेख में इमाम अली अ.स. की ज़िंदगी गुज़ारने का तरीक़ा आपके सामने बयान किया जा रहा है ताकि हम सभी उनके पैरवी करने वालों के सामने एक आइडियल ज़िंदगी आ सके ताकि उसकी रौशनी में हम अपनी दुनिया और आख़ेरत को कामयाब कर सकें। 

  • हलाल रोज़ी, 

अल्लाह और पैग़म्बर स.अ. की मर्ज़ी का ख़्याल मोमिन और ग़ैर मोमिन के बीच फ़र्क़ बताने वाली सबसे बुनियादी चीज़ों में से एक यही है जिसके बारे में इमाम सादिक़ अ.स. फ़रमाते हैं कि, ख़ुदा की क़सम इमाम अली अ.स. ने अपनी पूरी ज़िंदगी में एक निवाला भी हराम रिज़्क़ का नहीं खाया और ज़िंदगी में कभी भी ऐसे मोड़ पर खड़े नहीं दिखाई दिए जहां अल्लाह की मर्ज़ी के साथ कोई दूसरी चीज़ भी हो, और पैग़म्बर स.अ. की मर्ज़ी इस तरह हासिल की थी कि पैग़म्बर स.अ. को आप पर पूरा भरोसा था इसीलिए कई अहम मौक़ों पर वह आपसे मशविरा करते थे, पूरी उम्मत के बीच कोई भी इमाम अली अ.स. की तरह नहीं है जिसने बिल्कुल पैग़म्बर स.अ. की तरह ज़िंदगी गुज़ारी हो, लेकिन इसके बावजूद आप कभी संतुष्ट नहीं रहते बल्कि आप उम्मीद और ख़ौफ़ के बीच ही ज़िंदगी गुज़ारते थे (यानी अपने आमाल को देखकर ना ही जन्नत की पूरी उम्मीद कर लेते थे और ना ही अल्लाह की रहमत से ना उम्मीद हो कर ख़ौफ़ में जिंदगी गुज़ारते थे)। (अल-इरशाद, पेज 255)

इब्ने अब्बास से भी रिवायत है कि आप अपने हर काम में केवल अल्लाह की मर्ज़ी को ध्यान में रखते थे इसीलिए आपको मुर्तज़ा कहा जाता है। (अल-मनाक़िब, जिल्द 3, पेज 110) 

  • हक़ का समर्थन और बातिल के मुक़ाबले डट जाना 

आपके सिफ़ात में से एक अहम सिफ़त यह थी कि आप बातिल के मुक़ाबले किसी तरह की थोड़ी सी भी सुस्ती नहीं दिखाते थे बल्कि हक़ का विरोध करने वालों से डट कर मुक़ाबला करते थे, आपका ख़ुद कहना था कि अपनी जान की क़सम हक़ का विरोध करने वालों और हक़ के मुक़ाबले जंग करने वालों से किसी तरह की ना कोई नर्मी बरती जाएगी और ना किसी तरह का समझौता किया जाएगा। (नहजुल बलाग़ा, ख़ुत्बा 24) 

एक दूसरी जगह फ़रमाते हैं कि मेरी पूरी ज़िंदगी में मेरे दामन पर एक भी धब्बा नहीं है जिसका सहारा लेकर लोग बातें बनाएं और उंगली उठा सके, मेरी निगाह में समाज के दबे कुचले और पिछड़े लोग भी इज़्ज़तदार हैं और मैं उनको उनका हक़ दिला कर उनको ताक़तवर बनाऊंगा, और अहंकारी और ज़ालिम मेरी निगाह में कमज़ोर है जिसके क़ब्ज़े से दूसरों का हक़ वापस ले कर जिनका हक़ है उन तक पहुंचाऊंगा, हम अपने पूरे वुजूद के साथ अल्लाह के फ़ैसले और उसकी मर्ज़ी के आगे सर झुकाए हुए हैं। (नहजुल बलाग़ा, ख़ुत्बा 37) 

आप जो भी कहते उस पर अमल करते थे यही वजह है कि हक़ और अदालत को बाक़ी रखने और उसे फ़ैलाने की ख़ातिर मज़लूम का समर्थन अलवी ज़िंदगी की विशेषता थी, ज़ाहिर सी बात है कि दुनिया की चकाचौंध में मस्त रहने वाला कभी अदालत और हक़ को पसंद नहीं करेगा लेकिन इमाम अली अ.स. की निगाह में अल्लाह की मर्ज़ी से बढ़ कर कुछ भी नहीं था, इसीलिए आप कहा करते थे कि हक़ और अदालत की बात करना बहुत आसान है लेकिन उसे जारी (स्थापित) करना बहुत सख़्त है। 

  • इमाम अली अ.स. की सियासत में अल्लाह की मर्ज़ी बुनियादी सिध्दांत 

आपने अल्लाह की मर्ज़ी से हट कर कभी क़दम नहीं उठाया, चाहे जाहेलियत का दौर हो या इस्लाम आने के बाद का आपने अपने इस बुनियादी सिध्दांत को हमेशा हर चीज़ से ज़्यादा अपनी ज़िंदगी में अहमियत दी, यहां तक कि जब आपने ज़ाहिरी हुकूमत क़ुबूल फ़रमाई उस समय भी इस बुनियादी सिंध्दांत के बारे में फ़रमाया कि अल्लाह की क़सम मैंने हमेशा इस ओर ध्यान रखा है चाहे जाहेलियत का दौर हो चाहे उसके बाद का, मैंने अल्लाह की मर्ज़ी से हट कर कभी कोई क़दम नहीं उठाया, और इस राह में मैं ना ही मैं कभी कमज़ोर पड़ा और ना ही कभी किसी से डरा, और आज भी उसी की मर्ज़ी की ख़ातिर बातिल का सर कुचलने को तैयार हूं। (नहजुल बलाग़ा, ख़ुत्बा 33) 

आपके इन्हीं बुनियादी सिध्दांतों पर सख़्सी से अमल करने की वजह से ही बहुत से लोग आपके दुश्मन हो गए और पैग़म्बर स.अ. की वफ़ात के बाद आपको ख़लीफ़ा नहीं बनने दिया, उन गुमराह लोगों की निगाह में इमाम अली अ.स. का जुर्म केवल यही था कि आप अल्लाह की मर्ज़ी के अलावा एक क़दम नहीं उठाते, लोगों ने मुंह ज़रूर फेर लिया लेकिन आप अपने इन्हीं उसूलों को अपनी ताक़त समझते और यही कारण है कि कुफ़्फ़ार और मुशरेकीन हों या मुनाफ़ेक़ीन हर बातिल ताक़तों का आपने डट के सामना किया। 

  • अदालत में गंभीरता 

आपके अहम बुनियादी उसूलों में से एक अदालत भी थी, आप अदालत को लेकर काफ़ी गंभीर थे और पैग़म्बर स.अ. की वफ़ात के बाद ज़ाहिरी ख़िलाफ़त और हुकूमत को आपसे छीने जाने के पीछे एक यह भी अहम कारण था। 

अदालत का जारी करना और उसी के आधार पर फ़ैसला करना ना ही हर किसी के बस की बात है और ना ही हर किसी को पसंद है, जबकि दीनी और क़ुर्आनी तालीमात के अनुसार चाहे दुश्मन ही क्यों न हो उस पर भी ज़ुल्म करना ग़लत है। क़ुर्आन का अदालत को जारी करने के बारे में कहना है कि रिश्तेदारी और दोस्ती के चलते अदालत को जारी करने से मुंह न मोड़ो। (सूरए माएदा, आयत 8, सूरए अनआम, आयत 152) 

इमाम अली अ.स. के इस रवैये को वही लोग पसंद नहीं करते थे जिनके पास तक़वा नहीं होता था, क्योंकि क़ुर्आन की निगाह में अदालत, तक़वा से सबसे क़रीब है, रिवायत में है कि जिस समय इमाम अली अ.स. ने बैतुल-माल की रक़म को बांटने में अदालत से काम लिया और अमीर ग़रीब, काले गोरे, आज़ाद ग़ुलाम सबमें बराबर से बांटना शुरू किया, लोगों ने आप को घेर लिया और पिछली ख़िलाफ़त के तरीक़े बताने शुरू किए इमाम अ.स. ने फ़रमाया, क्या तुम लोग मुझे इस बात पर मजबूर करना चाहते हो कि जिन लोगों की सरपरस्ती की ज़िम्मेदारी मुझ पर है मैं उन पर ज़ुल्म करूं? अल्लाह की क़सम जब तक यह दुनिया बाक़ी है और आसमान पर सितारे मौजूद हैं मैं ऐसा कभी नहीं करूंगा और सुनो अगर यह मेरी अपनी दौलत होती तब भी जैसा तुम लोग चाह रहे हो वैसा मैं नहीं करता और यह तो अल्लाह की दौलत है इसमें कैसे मुमकिन है…..। (नहजुल बलाग़ा, ख़ुत्बा 124) 

आप अदालत को लेकर इतना गंभीर थे कि आपको अदालत और न्याय की प्रतिमा कहा जाता था, जैसाकि आपने ख़ुद फ़रमाया कि ख़ुदा की क़सम अगर सातों समुद्र, ज़मीन और वह सब कुछ जो इस आसमान के नीचे है मुझे दे कर मुझ से कहा जाए कि जौ के दाने के छिलके की नोक को चींटी के मुंह से छीनने के बराबर अल्लाह के हुक्म को न मानूं तब भी मैं ऐसा नहीं कर सकता क्योंकि तुम्हारी यह दुनिया मेरी निगाह में टिड्डी के चबाए हुए पत्ते से भी बदतर है, अली (अ.स.) को इन मिट जाने वाली नेमतों और उसके मज़े से क्या लेना देना….। (नहजुल बलाग़ा, ख़ुत्बा 222)

  •  बे सहारा लोगों की मदद

 इमाम अली अ.स. की ज़िंदगी की एक और अहम बात यह थी कि आप हमेशा बे सहारा लोगों की मदद करते थे, ज़ाहिर है समाज में बे सहारा और ग़रीब लोगों को और कुचल दिया जाता है न उनकी फ़रियाद कोई सुनता है न उनके साथ अदालत और ईमानदारी के साथ सुलूक होता है, लेकिन आपने अदालत को जारी करते हुए न केवल ऐसे लोगों की मदद की बल्कि अपनी करामत और शराफ़त की मिसाल भी पेश की, पैग़म्बर स.अ. आपकी इस सिफ़त के बारे में फ़रमाते थे कि यह अल्लाह का दिया हुआ तोहफ़ा है और ऐ अली (अ.स.) अल्लाह ने आपको बनाया ही इस तरह है कि आप बे सहारा और ग़रीब लोगों की मदद करते रहें और उनके साथ समय बिताएं, और आप उनको अपनी पैरवी करने वाले समझ कर उनसे मोहब्बत करें और वह आपको अपना इमाम समझ कर। (हिल्यतुल-औलिया, जिल्ज 1, पेज 71) 

  • नेक कामों में सबसे आगे 

क़ुर्आन ने नेक कामों की तरफ़ क़दम बढ़ाने में जल्दी करने वालों के हौसले को बढ़ावा दिया है और उनकी तारीफ़ की है, (सूरए बक़रह, आयत 148, सूरए माएदा, आयत 48) ईमान और नेक अमल की तरफ़ दावत देने वाले ईमान और अमल में सबसे आगे दिखाई देते हैं जौसाकि इमाम अली अ.स. अपने बारे में फ़रमाते हैं कि ख़ुदा की क़सम मैं तुम लोगों को किसी भी अमल की उस समय तक दावत नहीं देता जब तक मैं ख़ुद अमल नहीं कर लूं और केवल वही काम करने से मना करता हूं जिसे मैं ख़ुद अंजाम नहीं देता। (नहजुल बलाग़ा ख़ुत्बा 173) 

  • खाना पीना 

आप सभी इमाम अली अ.स. की ख़ुराक़ के बारे में अच्छी तरह जानते हैं इसलिए बस एक रिवायत नक़्ल कर रहा हूं, रावी कहता है कि मैंने इमाम जाफ़र सादिक़ अ.स. से सुना कि आपने फ़रमाया, इमाम अली अ.स. बिल्कुल पैग़म्बर स.अ. की तरह खाना खाते थे, आप ख़ुद सिरका रोटी और ज़ैतून का तेल खाते थे लेकिन जब कोई आपके दस्तरख़ान पर आता था तो उसे गोश्त रोटी खिलाते थे। (काफ़ी, जिल्द 6, पेज 328) काम में मेहनत आप अपनी ज़िंदगी में किसी भी काम में शर्म नहीं करते थे, और वही काम करते थे जिससे पूरे समाज को फ़ायदा हो, जैसे क़ुर्आन के हुक्म को (सूरए हूद, आयत 61) निगाह में रखते हुए आप बंजर ज़मीनों को उपजाऊ बनाते थे, रिवायत में है कि आप बेलचा चलाते समय इस आयत की तिलावत करते थे कि क्या इंसान यह सोंचता है उसे ऐसे ही बेकार छोड़ दिया गया है… (सूरए क़यामत, आयत 36)

 इमाम सादिक़ अ.स. आपके काम करने को लेकर इस तरह फ़रमाते हैं कि कभी कभी इमाम अली अ.स. जंगल जाते समय अपने हाथ में खजूर के बीज ले कर जाते और जब कोई आपसे पूछता कि आपके हाथ में क्या है तो आप जवाब देते कि इंशा अल्लाह यह एक खजूर का पेड़ है, फिर आप जाते और मेहनत करते और उन खजूर के बीज को बो देते और जब उनमें फल आते तो आप उसका एक भी फल नहीं खाते थे। (काफ़ी जिल्द 5, पेज 75) 

आप अपनी और अपने परिवार के सारे ख़र्चे ख़ुद मेहनत और मज़दूरी कर के पूरा करते थे आप बैतुल माल की रक़म के भरोसे नहीं रहते थे बल्कि आप ख़ुद ऐसा काम करते जिससे और दूसरे लोगों के परिवार का ख़र्च भी उसी से निकल आए, आप ख़ुद फ़रमाते थे ऐ कूफ़ा वालों अगर तुम लोगों ने कभी देखा कि मेरे पास मेरी ज़िंदगी की ज़रूरत से ज़्यादा निजी सामान, सवारी और ग़ुलाम हैं तो समझ लेना मैंने ख़ेयानत और धोखा किया है। (अल-ग़ारात, पेज 44)

  • सादा ज़िंदगी 

आप बाग़ों में काम करके इतनी रक़म हासिल कर लेते थे कि आपकी ज़िंदगी आराम से गुज़रे लेकिन आप उस सभी रक़म को अल्लाह की राह में ख़र्च कर देते थे, आपका हक़ छिनने के समय की ज़िंदगी हो या ज़ाहिरी ख़िलाफ़त पर आने के बाद की दोनों में आपने साधारण जीवन बिताया है, जबकि उस समय मुसलमानों की ताक़त के हर तरफ़ चर्चे थे और मुसलमान अच्छी ज़िंदगी गुज़ार रहे थे लेकिन आपने अपने लिए सादी ज़िंदगी ही को चुन रखा था, आप ख़ुद ही फ़रमाते थे कि ख़ुदा की क़सम मेरे कपड़ों पर इतना रफ़ू हो चुका है कि अब रफ़ू करने वाले को देने से शर्म आने लगी है, आपने लगभग पांच साल हुकूमत की लेकिन इस दौरान ना ही एक ईंट अपने घर में लगाई ना ही कोई ज़मीन अपने नाम की, बल्कि जैसे ज़ाहिरी हुकूमत से पहले एक साधाराण इंसान की तरह ज़िंदगी गुज़ार रहे थे बिल्कुल उसी तरह हुकूमत के आने बाद भी एक सादा ज़िंदगी गुज़ार रहे थे। (अल-मनाक़िब, इब्ने शहर आशोब, जिल्द 2, पेज 95) 

  • इबादत और बंदगी 

इमाम अली अ.स. ने सूरए ज़ारियात में इंसान के पैदा होने के मक़सद इबादत के बताए जाने की रौशनी में अपनी ज़िंदगी को अल्लाह की इबादत के लिए वक़्फ़ कर दिया था, इमाम सादिक़ अ.स. फ़रमाते हैं कि इमाम अली अ.स. वज़ू के लिए किसी को पानी तक नहीं लाने देते और न ही वज़ू में किसी की मदद स्वीकार करते आपका कहना था कि मुझे अपने और अल्लाह की बारगाह में हाज़िरी देने के बीच किसी का आना पसंद नहीं है। (एललुश-शराएअ, जिल्द 1, पेज 323) 

आपकी निगाह में नमाज़ एक अल्लाह की अमानत है जिसको बंदे बंदगी की शक्ल में अदा करते हैं, रिवायत में है कि जब नमाज़ का समय आता तो आपके चेहरे का रंग पीला पड़ जाता था और आपका बदन कांपने लगता था, जब आपसे पूछा जाता कि ऐसा क्यों होता है तो आपने फ़रमाते कि उस अमानत के अदा करने का समय आया है जिसको संभालने की ज़िम्मेदारी आसमानों, ज़मीन और पहाड़ों को दी गई तो उन्होंने इस ज़िम्मेदारी को लेने से मना कर दिया था लेकिन इंसान ने इस अमानत को स्वीकार किया था। (अल-मनाक़िब, जिल्द 2, पेज 124, सूरए अहज़ाब, आयत 72) 

यही वजह है कि आपकी एक विशेष जगह थी जहां आप केवल अल्लाह की इबादत करते थे, इमाम सादिक़ अ.स. फ़रमाते हैं कि इमाम अली अ.स. ने अपने घर में एक कमरा जो न बहुत बड़ा था और ना ही बहुत छोटा अल्लाह की इबादत के लिए विशेष कर रखा था आप उसी कमरे में अल्लाह की इबादत अंजाम देते थे। (अल-महासिन, जिल्द 2, पेज 425) 

  • नेक औलाद आंखों की ठंडक 

इमाम अली अ.स. की निगाह में नेक औलाद इंसान की आंखों की ठंडक होती है, और नेक औलाद पूरे समाज के लिए फ़ायदेमंद होती है, नेक औलाद वालेदैन की आंखों की रौशनी बढ़ने और आख़ेरत में काम आने का कारण होती है, बच्चों की दीनी तरबियत वालेदैन की अहम ज़िम्मेदारियों में से है, आपका इस बारे में कहना था कि ख़ुदा की क़सम मैंने कभी अल्लाह से ख़ूबसूरत औलाद नहीं मांगी बल्कि हमेशा ऐसी औलाद मांगी जो अल्लाह की इताअत करती हो और अल्लाह का ख़ौफ़ उसके दिल में पाया जाता हो, और ऐसी औलाद मांगी जिसको हर समय अल्लाह की इताअत करता हुआ देखूं ताकि मेरे आंखों को ठंडक पहुंचे। (तफ़सीरे साफ़ी, जिल्द 4, पेद 27)

RELATED ARTICLES

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here

Most Popular

Recent Comments