Thursday, April 25, 2024
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आतंकवाद और इस्लाम का कोई नाता नहीं: इन्द्रेश कुमार

V.o.H News: आरएसएस के इंद्रेश कुमार का क्या कहना है इस्लाम और हिंदुस्तान के बारे में.. विशेष संवाददाता अली अब्बास नकवी ने इंद्रेश कुमार से की खास बातचीत

अली अब्बास नकवी – 1400 साल पहले एक यज़ीद था जिसने पैगंबर साहब के नवासे समेत 72 साथियों को तीन दिन तक भूखा प्यासा शहीद कर दिया था.. कैसे देखते हैं आप इसको? और भारत का कैसे रिश्ता जुड़ा हुआ है इस्लाम से..

इंद्रेश कुमार -हज़रत इमाम हुसैन अ.स एक रुहानी आध्यात्मिक प्रकार के इंसान थे. यजीद एक हिंसा का आतंक का प्रतीक था.. यजीद को इमाम हुसैन अ.स की रुहानी शक्तियां पसंद नही थी.. इसीलिए यज़ीद नही चाहता था कि इमाम हुसैन अ.स अरब में रहे और ज़िंदा रहे.. इसीलिए इमाम हुसैन अस के बारे में ये बात कही जा सकती है कि वो हिंसक, कट्टर, नफरत वाली ताकत नहीं थे बल्कि मोहब्बत भाई चारा रुहानियत की ताकत थे.

कुछ बातें ज़रुर में मोहर्रम के महीने की वजह से कहना चाहता हूं. .

जिनसे मजहब ए इस्लाम शुरू हुआ… पैगंबर साहब जो आखिरी रसूल हैं . जब हालात ऐसे बने जब उन्हें मक्का से मदीना जाना पड़ा .. महीने से ज्यादा का सफर था.. बीच बीच में कबिलाई उनपर हमले होते थे.. उन सबसे अपने आपको सुरक्षित रखते हुए मदीना शरीफ जा रहे थे.. उस समय की यात्रा में संकटों में, मुश्किलों में वो एक बात ये कहते थे कि जब में तन्हा और तन्हाई में(यानि मुसिबतों में, संकटों में) रहता हूं तो मुझे सुकून की ठंडी हवाएं(रुहानी हवाएं)  पूर्व (यानि हिंदुस्तान) से आती है.. रुहानी हवाओं का मतलब होता है जिससे कष्ट दूर हों, रोशनी मिले.. रास्ता दिखे और उस रास्ते पर चलके हिम्मत और हौंसला आए.. इसलिए आखिरी रसूल मोहम्मद साहब की हिंदुस्तान के लिए ये अवधारणा और राय रही है..

ऐसे ही कुछ सालों के बाद कर्बला से हज़रत इमाम हुसैन अ.स की आवाज़ आती है.. 

अली अब्बास नकवी – इमाम हुसैन अ.स और हिंदुस्तान का रिश्ता कैसा है?

इंद्रेश कुमार -इमाम हुसैन अ.स और भारत का रिश्ता बहुत ही अजीब और प्यारा रिश्ता था.. क्योंकि ईरान के शाह की या उनके परिवार में से दो बेटियां थी.. एक थी शहर बानों और दूसरी थी महर बानों..

शहर बानो इमाम हुसैन अ.स की बीवी थी.. और महर बानों उस समय भारत में उज्जैन के शासक चंद्रगुप्त द्वीतीय की धर्म पत्नी थी..

जिस वक्त यज़ीद की फौज ने कर्बला में इमाम हुसैन अ.स को घेर लिया तो इमाम हुसैन अ.स ने ख्वाहिश की थी कि मैं यहां से चले जाउंगा और मुझे हिंदुस्तान की सरज़मी पर जाने दों…

लेकिन उन्हें जाने नही दिया और उनपर अत्याचार किया गया.. और उनके  6 महीने के पुत्र को भी कत्ल किया गया.. लेकिन इमाम हुसैन अ.स जानते थे कि 6 महीने के बच्चे का खुन जब ज़मीन पर गिरेगा तो ज़मीन भी रोएगी.. इस लिए उन्होने उनका खुन अपने जिस्म पर लगा लिया.. इसी तरह उनके साथ 71 साथियों को शहीद किया गया.. और उनपर ज़ुल्म किया गया..

यज़ीद के अत्याचार के बाद साफ है कि वो हिंसा का, शैतान का. अत्याचार का.. अन्याय का अपनाने वाला था.. और इमाम हुसैन अ.स एक मानवीय और देविए फरिश्ते वृत्ति के इंसान थे..

इमाम हुसैन अ.स ने उस परेशानी की घड़ी में उज्जैन में चंद्रगुप्त द्वीत्तीय को पत्र लिखा था. हालांकि चंद्रगुप्त द्वीत्तिय का उस वक्त निधन हो चुका था.. जिसके बाद उनके बेटे शासक थे.. उनके बेटे ने जब मौसा का खत प्राप्त किया तो उन्होंने अपनी मां से चर्चा की ..जिसके बाद एक बड़ी सेना को भेजा जिसमें तत और मुझाल जो ब्रहाम्ण के अंदर के उपजाति के लोग थे.. जो युद्ध सैनानी हुआ करते थे..जिनका कद तकरीबन 6 फूट लंबा होता था.. लेकिन जबतक ये करबला के मैदान में पहुंचते तब तक इमाम हुसैन अ.स को कत्ल कर दिया गया था… 

इसी लिए इमाम हसन और हुसैन अ.स के नाम से जो पूरे देश और दुनिया में मोहर्रम में ताजिये निकलते हैं एक तरह से आतंक, हिंसा, और जुल्म करने वालों के खिलाफ खड़े होने का प्रतीक है.. और अहिंसा, धर्म और मानवता के मार्ग पर चलने का मार्ग दिखाता है…. 

इसीलिए मोहर्रम का दिन आतंकवाद और अत्याचार की मुक्ति के लिए दी गई इमाम हुसैन अ.स और उनके साथियों की शहादत को याद दिलाता है…

अली अब्बास नकवी -कैसे समाज में शांति होगी, युवाओं को कौनसा रास्ता अपनाना चाहिए?

इंद्रेश कुमार -मैं सभी से अपील करता हूं कि इमाम हसन अ.स और इमाम हुसैन अ.स की याद में जो भी ताजियेदारी, अज़ादारी होती है वो होती रहे और उसी के साथ ही साथ अपने भारत और विश्व को शैतान से, गोलीबारी से, आतंक से, हिंसा से मुक्त करेंगे ये एक संकल्प भी लेना आवश्यक है.. क्योंकि इमाम हुसैन अ.स का रास्ता हिंसा, आतंकवाद के विरोध में था और इंसानियत, अहिंसा और धर्म को बचाने के लिए इमाम हुसैन अ.स ने बलिदान दिया था..

अली अब्बास नकवी – इमाम हुसैन अ.स के बलिदान से क्या प्रेरणा लें –

इंद्रेश कुमार– इमाम हुसैन अ.स के बलिदान से और भी प्रेरणा लेनी चाहिए..

1.       मोहर्रम के दिन या आस पास की तारिख में बड़ी मात्रा में रक्तदान हो ताकि नौजवान अपना खुन देकर उन लोगों को अपना खुन इमाम हुसैन अ.स की याद में दे सकें जिससे इमाम हुसैन अ.स का मकसद इंसानियत को पूरा किया जाए..

2.       साथ ही साथ राजनीतिज्ञ लोग ज़रुर धर्म के नाम पर बंटवाते हैं.. लेकिन इस दिन में हर धर्म के लोगों को साथ जोड़कर चलें.. क्योंकि धर्म जोड़ता है.. और इस दिन को सभी धर्मों के लोगों को जोड़ने के दिन में मनाना चाहिए.. जिससे हर धर्म के लोगों को ये बलिदान भी पता चले और उस बलिदान से सीखते हुए आज और आने वाले समय में आतंक, अहिंसा के खिलाफ सब एक साथ खड़े होंगे..जिससे भाईचारें का, सेवा का माहौल होगा और आपस में झगड़े नहीं होंगे..

 

इसीलिए आखिरी रसूल हज़रत मोहम्मद साहब (सवस) कहते थे कि मुझे सुकुन की ठंडी हवाएं हिंदुस्तान से आती है..  खुद इमाम हुसैन अ.स ने कहा कि धरती पर अगर कोई खुदाई मुल्क है तो वो हिंदुस्तान है..  और उन्होंने हिंदुस्तान आने की भी ख्वाहिस ज़ाहिर की थी..

इस्लाम का रिश्ता और हिंदुस्तान का रिश्ता बहुत ही प्यारा रहा है. लेकिन इस रिश्ते को कुछ लोगों ने बदनाम किया है.. उसमें चाहे बाबर, हुमांऊ, ओरंगज़ेब, अकबर रहा हो चाहे अलाउद्दीन रहा हो.. इनके प्रति भी सोचना चाहिए कि ये विदेशी थे जिन्होंने काफी अत्याचार किया.. ना ही इन लोगों ने विश्वविद्यालय खोले… ना ही कोई अस्पताल खोले.. ना ही कोई उद्योग लगाए.. ताकि ये देश अनपढ़ रहे तरक्की ना कर सके, ये देश बेरोज़गार रहे.. स्वस्थ न रह पाए बल्कि जो उद्योंग, विश्वविद्यालय और स्वाथ्य केंद्र खुले थे उन्हें भी बंद करने का काम किया.. 

आज के दौर में दुनया को इमाम हुसैन अ.स के बलिदान को याद करते हुए नया भारत नई पहल करनी चाहिए..
 
अली अब्बास नकवी –  वो कौन लोग जो इस्लाम का नाम लेकर आतंक मचाते है

इंद्रेश कुमार – कुछ लोगों ने इस्लाम का रूप ऐसा बनाया है कि ये कट्टरता, अराजकता, का मजहब है. इसीलिए वो अब्दुल कलाम को पसंद ना करते हुए वो अफज़ल, कसाब, बुरहान वानी से जुड़े हैं.. जबकि ज़रुरत है कि हम युवको, बच्चों के सामने ‘कसाब नहीं कलाम’ ये आइकन के रुप में बताते रहें..  इसी प्रकार से लश्करे तैय्यबा के नाम से, जैश ए मोहम्मद के नाम से हिंसा कट्टरता के रुप में कहीं हाफिज़ सईद दिखता है तो कहीं गिलानी दिखते है.. ये रोल मॉडल नहीं हो सकते हैं..

ऐसे ही यज़ीद रोल मॉडल नही है..यज़ीद सिर्फ कट्टरता और हिंसा का रोल मॉडल हो सकता..

वहीं इमाम हुसैन अ.स रोल मॉडल हैं भाई चारा, मोहब्बत और विकास के.. और उन्हीं का ये रास्ता सत्य का रास्ता है. सही रास्ता है. और इसी पैगाम को जन जन तक पहुंचाना चाहिए.. जिससे विश्व में शांति हो सके..

 

 

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