Thursday, April 25, 2024
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हिंदुस्तान में हिन्दुओ के बिना पूरा नहीं मुहर्रम 

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भारत के कई हिस्सों में मुहर्रम में इमाम हुसैन के गम में हिंदू परिवार भी शामिल होते हैं.

इलाहाबाद. यूपी के कौशांबी जिले में एक गांव ऐसा भी है, जहां हिंदू परिवार के लोग पूरी शिद्दत से इमाम हुसैन का गम मनाते है। गांव का हर इंसान पूरी इबादत से मुहर्रम में अपने परिवार के साथ ताजियादारी करता है। यह परंपरा पिछले 107 सालों से गांव में कायम है।

यहां रहते है 50 हिंदू परिवार

– कौशांबी के अलीपुर जीता गांव की तरफ जाने वाली सड़क इमामे हुसैन की सदाओं में डूबी है।

– इसी सड़क से होकर एक रास्ता हिन्दू मोहल्ले की तरफ भी जाता है, जहां नफरत और मजहब की दीवार दरवाजे पर पहुंचते ही दम तोड़ देती है।

– यह तस्वीर इस बात की गवाह है हिन्दू परिवार जिस तरह पूरी सिद्दत से अपने त्यौहार मनाता है। उसी आदर और सत्कार से मुहर्रम में ताजियादारी भी करता है।

– यहां का हर इंसान अपने परिवार साथ ताजिया को सम्मान के साथ रख इबादत करता है।

क्यों मनाते है हिन्दू हुसैन का गम 

– बताया जाता है कि इस गांव में अंग्रेजी हुकूमत के समय सन 1910-11 में खेतो में पानी ले जाने के जाने को लेकर झगड़ा हुआ था।

– इसमे हिन्दू परिवार के 27 लोगो को अंग्रेज सरकार ने फांसी की सजा सुनाई थी, जिससे पुरे गांव में हड़कम्प मच गया था।

– उस वक्त गांव के बरख्त अली ने हिंदुओ को सलाह दी थी की अल्लाह से दुआ मांगे तो फांसी की सजा टल सकती है।

– सजा मिलने के बाद लोगो ने मुहर्रम के समय यह दुआ मांगी की यदि अल्लाह फांसी की सजा टाल दे तो वह हर साल पूरी सिद्दत और परंपरा से अजादारी और ताजियादारी करेंगे।

– दुआ कबूल हुई और जिसका नतीजा है कि आज भी अलीपुर जीता गांव में हिन्दू परिवार के दर्जनों लोग मुहर्रम का पर्व पूरी शिद्दत से मानते है।

एक हिन्दू परिवार  92 सालों से मना रहा है मुहर्रम, बनाता है ताजिया

वाराणसी। काशी गंगा जमुनी तहजीब के लिए पूरे विश्व में मशहूर है। काशी में रहने वालों ने धर्म और मजहब से ऊपर उठने के कई प्रमाण भी दिए हैं। बनारस के ब्रह्मनगर इलाके के कबीरनगर कॉलोनी के रहने वाले स्वर्गीय होरीलाल का परिवार 92 सालों से इमाम हुसैन पर रो रहा है। इस बार भी अपने हाथों से उन्होंने ताजिया बनाया। मोहर्रम के रस्म को निभाने वाला ये परिवार 15 दिनों पहले से पूरी तैयारियां कर खुद बांस की लड़की, गोटे, कागज लगाकर मन्नत का ताजिया बनाता है और मातम भी मनाता है।

मन्नत पूरी होने पर शुरू किया ताजिया बनाना

स्वर्गीय होरीलाल के परिवार के मनोज ने एक पत्रकार से  बताया कि पहले हमारा परिवार बनारस के ही शिवाला इलाके में रहता था तब हमारे दादा जी जिंदा थे । एक बार हमारी बुआ मन्नो देवी की तबियत ज्यादा खराब ही गयी थी। कई डॉक्टरों और हकीमों को दिखाने के बाद भी उन्हें आराम नहीं मिला तो हमारे आसपास कई मुस्लिम परिवार रहते थे। दरगाह पर जाने से बुआ हुई थी ठीक एक दिन पड़ोस के रहने वाले मुस्लिम दादाजी ने मेरे दादा होरीलाल से बुआ को लेकर फातमान कब्रिस्तान में बीबी फातमा की दरगाह पर ले जाने का सुझाव दिया। सब लोग बुआ को लेकर वहाँ गए और वापस आने के बाद ही बुआ मन्नो देवी की तबियत ठीक हो गयी। तब से हम लोगों के घर मे ताजिया बैठाया जाता रहा है, जो आज भी चल रहा है।

अकीदत से मनाते हैं मोहर्रम

मनोज बताते हैं कि तब से लेकर अब तक हमारा पूरा परिवार मोहर्रम में ताजिया को बैठाने से लेकर सभी रस्मों को निभाता है। हम लोग मुहर्रम के आठवें दिन घर से ताजिया लेकर अपने पुराने घर के पास बने चौक शिवाला पर जाते हैं और पूरी रात मातम करते हैं। दूसरे दिन यानी नौवें दिन हम लोग ताजिया को लेकर फातमान दरगाह जाते हैं जहाँ गड्ढे में ताजिया को दफन करने के बाद पानी डालकर ठंडा करते हैं, फिर वापस घर आते हैं जहाँ तीजा की रस्म निभाई जाती है।

यहां हिंदू बनाते हैं मुहर्रम के ताबूत, 150 साल से चली आ रही परंपरा

महाराष्ट्र के सांगली जिले के कड़ेगाव में हिंदू-मुस्लिम एकता का प्रतीक माने जाने वाले ताबूतों की परंपरा पिछले 150 सालों से बड़ी धूमधाम से मनाई जा रही है. मुहर्रम पर यहां बने आसमान को छुते ताजिया  और उनका एक दूसरे के साथ अनोखा मिलाप देखने के लिए दूर-दूर से लोग आते हैं. इन ताजियों को हिंदू बनाते हैं. इस प्रथा को हिंदुओं ने ही शुरू किया है.

कैसे बनाते है गगन चूमने वाले ताजिया?

इस गांव में 200 से 250 फीट ऊंचाई के ताजिया बनाए जाते हैं, जो बंबू की लकड़ी से बनाए जाते हैं. आठ कोनों के आकार में यह ताबूत बनाए जाते हैं. इन ताबूतों का शिखर पहले बनता है और आखिर में उसका बेस बनाया जाता है. ताबूत बांधते वक्त चिकनी मिट्टी में सूती धागा लपेटकर ताबूतों की मंजिलें एक दूसरे पर बिठाई जाती हैं. यह करते वक्त कोई भी गांठ नहीं दी जाती. यही इन ताबूतों की खासियत है.

पूरे गांव में निकाली जाती है झांकी

एक ताजिया उठाने के लिए 300 से 400 लोगों का होना जरूरी होता है. पुरे गांव में उसकी झांकी निकाली जाती है. ताजिया उठाने का पहला सम्मान देशपांडे, कुलकर्णी, शेटे, वालिंबे, सुतार और देशमुख का होता है. यह नजारा देखने के लिए गुजरात महाराष्ट्र, कर्नाटक, आंध्र प्रदेश से लाखों भक्त आते हैं.

हर घर में बनता है मीठा और शरबत

ताजियों को बनाने वाली टीम के एक सदस्य नासील पटेल ने बताया, ‘कड़ेगांव में जो मोहर्रम  मनाया जाता है, वो अपने आप में एक मिसाल है. ये मुस्लिम त्यौहार होने के बावजूद हिंदू लोग इसे मनाते हैं. इस दिन गांव के हर घर में मीठा और शरबत बनता है.

इन हिंदुओं के बिना पूरा नहीं मुहर्रम

लखनऊ और जयपुर में मनाए जाने वाले ऐसे ही मुहर्रम पर हमारी ख़ास रिपोर्ट.

जयपुर: मुहर्रम पर बरसों से हिन्दू-मुस्लिम सदभाव की ख़ुशबू बिखेरता आ रहा है सरसों का ताज़िया. राजस्थान के सांभर लेक क़स्बे में निकाला जाने वाला यह ताज़िया एक हिन्दू परिवार निकालता है.

राजधानी जयपुर से कोई 80 किलोमीटर दूर स्थित इस क़स्बे में रंगीन पन्नियों और ख़ूबसूरत झालरों से सज़े ताज़ियों के बीच सरसों की ताज़ा सौंधी सुगंध वाला यह ताज़िया आकर्षण का विशेष केंद्र रहता है.

वैसे मुहर्रम पर ताज़िये मुस्लिम समुदाय के लोग ही निकालते हैं पर यह हरियाला ताज़िया कुछ निराला ही है.

हाजी फ़ैज़ुल्लाह ख़ान अब 75 बरस के हैं और अपने बचपन से ही इस ताज़िये की परंपरा देख रहे हैं. वे इसे हिंदू-मुस्लिम एकता की एक “बेहतरीन मिसाल” मानते हैं. हिन्दू और मुस्लिम दोनों ही इस मौक़े पर बांटे गए तबर्रुक (प्रसाद) को शौक़ से लेते हैं.

उनका कहना है कि लोगों की इसमें बहुत आस्था है और हिन्दू महिलाएं ख़ास तौर पर अपने बच्चों की सलामती और स्वास्थ्य के लिए उन्हें इसके नीचे से निकालती हैं.

डेढ़ सौ बरस पुरानी परंपरा

क़स्बे के एक हिन्दू अग्रवाल-कयाल परिवार द्वारा बंजारों के पीर बाबा से कारोबार और औलाद की आस पूरी होने के बाद से आभार स्वरुप यह परंपरा कोई सौ-डेढ़ सौ बरस पहले शुरू की गई.

कयाल परिवार पारंपरिक रूप से नमक के व्यवसायी रहे हैं और आज़ादी के पूर्व बंजारे जगह-जगह घूमकर सांभर झील का नमक बेचा करते थे. सरसों का ताज़िया आज भी बंजारों की मस्जिद में ही तैयार किया जाता है.

कयाल परिवार के द्वारका प्रसाद गोयल ने एक न्यूज़ चैनल  को बताया कि सरसों की हरियाली हिन्दू मुस्लिम भाईचारे का प्रतीक है.

सरसों का ताज़िया उनके परिवार की देखरेख में तैयार किया जाता है. इसे बनाने के लिए पहले बांस की खपच्चियों से ताज़िया तैयार कर सरसों के दानों को गीली रुई में रखकर इस पर लपेटा जाता है.

इसकी 24 घंटे देख रेख की ज़रूरत रहती है. इसके लिए एक व्यक्ति पूरे वक़्त तैनात रखा जाता है जो बराबर पानी का झिड़काव करता है.

मुहर्रम के दिन ताज़िये की कर्बला के लिए रुख़सती के पहले कयाल परिवार द्वारा ताज़िये बनाने वाले बाबू भाई बंजारा के परिवार और मस्जिद के मौलवी को साफ़ा पहनाया जाता है और ताज़िये के चौक में आने पर पैसे और कौड़ियों की बौछार की जाती है.

उन्होंने बताया कि बहुत से लोग उछाले गए सिक्कों का ताबीज़ बनवा कर अपने बच्चों के गले में पहनाना भी शुभ मानते हैं.

ताज़िये पर सरसों कितनी फूली है और रंग कैसा खिला है, इससे लोग फ़सल कैसी होगी इसका भी अंदाज़ा लगाते हैं.

लखनऊ

लखनऊ में शिया मुसलमानों की संख्या अधिक होने की वजह से मुहर्रम का महीना पूरे धार्मिक जोश से मनाया जाता है. पुराने लखनऊ के इमामबाड़े और कर्बलाओं में मातम जैसा माहौल नज़र आता है.

यहां के मुहर्रम की ख़ास बात है इसमें हिन्दुओं का हिस्सा लेना. बहुत ऐसे हिन्दू परिवार हैं जो मुहर्रम में उसी विश्वास से शिरकत करते हैं जैसे कोई शिया करता है. इनमें कई तो ब्राह्मण परिवार हैं जो अब हुसैनी ब्राह्मण के नाम से जाने जाते हैं.

नरही मोहल्ले के रमेश चंद, उनका बेटा राजेश अपने घर में ताज़िया रखे हैं और हज़रत अब्बास के नाम पर अलम खड़ा करने की तैयारी में हैं. रमेश चंद हिन्दू त्यौहार भी मनाते हैं लेकिन उनका हज़रत अब्बास में अटूट विश्वास है. वे कहते हैं, “हम मरते दम तक इनका साथ नहीं छोड़ेंगे.”

रमेश, जो भूतपूर्व सैनिक हैं, बताते हैं कि जब वे ताज़िया दफ़नाने के लिए तालकटोरा के कर्बला जाएंगे तो उनके ससुराल और मोहल्ले के लोग उनके साथ होंगे.

पिछले 15 साल से मुहर्रम मना रहे रमेश कहते हैं कि उनके मोहल्ले में क़रीब 50 हिन्दू परिवार हैं और वो सब तालकटोरे तक जाएंगे. रमेश कहते हैं, “इनमें से किसी को हमारे मुहर्रम मनाने से कोई आपत्ति नहीं है.”

हरीश चन्द्र धानुक एक और हिन्दू हैं जिनको “अज़ादारी और ताज़िया दारी” में अटूट विश्वास है. वे कहते हैं, “भैया हमारे यहां 1880 से ताज़िया दारी और अज़ादारी चली आ रही है.”

हरीश लखनऊ स्थित रेलवे के लोको वर्कशॉप से जूनियर इंजीनियर के पद से रिटायर हुए थे.

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