Tuesday, May 28, 2024
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Video: लॉकडाउन में जो मजदूर घर नहीं पहुँच पाए और रास्ते में ही अपनी जान गँवा बैठे उन मजदूरों के लिए दिल्ली पुलिस के सब-इंस्पेक्टर ने लिखी कविता

कोरोना महामारी के इस विकट समय में हमारे देश में बहुत से मजदूर भाई लॉक डाउन के नियमो का पालन करते हुए अपने घरों से दूर हैं लेकिन उनमे से कई पैदल ही अपने घरों के लिए निकल पड़े और दुर्भाग्यवश घर नहीं पहुँच पाए और रास्ते में ही अपनी जान गँवा बैठे यह रचना उन्ही मजदूर भाइयों को समर्पित है

 

निष्प्राण मुसाफिर

कविता को विडियो में सुनने के लिए यहाँ क्लिक करें

मुसाफिर वो भूख प्यास से हुआ व्याकुल,

रोजगार खोने की व्यथा से है शोकाकुल,

आँखों में अपनों से मिलने की आस लिए,

सूखे होठों पर अनजानी सी प्यास लिए,  

जिसकी फटी झोली में सिमटी गरीबी और लाचारी है,

 

वो क्या जाने जीवन की दुश्मन भूख है या फिर बीमारी है ||

वो क्या जाने जीवन की दुश्मन भूख है या फिर बीमारी है ||

 

डगर कठिन है दूर है मंजिल अभी, 

है बेबसी उसकी अश्रु भरी आँखों में,

बाधाएं अब पथ पर आयें तो क्या, 

मौसम भी रौद्र रूप दिखाए तो क्या, 

निर्धनता उसकी अभिलाषा नहीं, उसकी तकदीर है, 

 

उसकी बोझिल आँखों में भी सुनहरे सपनों की तस्वीर है||

उसकी बोझिल आँखों में भी सुनहरे सपनों की तस्वीर है||

 

मगर ये क्या ! वो राही तो निष्प्राण हुआ,

जीवन के पथ पर, यूँ दुनिया से अनजान हुआ, 

सुनहरे सपनों का घरोंदा टूटकर बिखर गया, 

तमन्नाएँ बाकी रही, लहू जिस्म का ठिठुर गया, 

उसकी ये निर्जीव ख़ामोशी, आँखों में शूल सी चुभती है, 

 

गाँव की गलियां व आंगन की रौनक भी अब रूठी-रूठी सी दिखती है ||

गाँव की गलियां व घर की रौनक भी अब रूठी-रूठी सी दिखती है ||

 

एक नारी है जो उसके आने की आस लिए बैठी है, 

जिसकी हालत बिन पानी पोखर के जैसी है, 

उसकी पीड़ा और दुःखों को कौन अब सहलाएगा,

कौन उसके अश्रु पोंछेगा और उसको न्याय दिलाएगा, 

ईश्वर तूने ये क्या खेल रचा, दुहान अब तो जीवन बोझिल सा लगता है,

 

सूना-सूना आंगन है और बसंत भी पतझड़ सा लगता है ||

सूना-सूना आंगन है और बसंत भी पतझड़ सा लगता है ||

 

रचनाकार – राकेश दुहान, दिल्ली

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